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Thursday, January 28, 2016

मरने के बाद रोहित का पहला इंटरव्यू



नमस्कार, मैं ऋषिराज आज आपको एक ऐसा इन्टरव्यू पढाने जा रहा हूं जो अपने आप में नये किस्म का हैं। मैने मर चुके दलित छात्र रोहित का इन्टरव्यू किया है । ये मेरी एक कोशिश है कि एक शोषित वर्ग के छात्र को कैसी दिक्कते आयी होंगी । यहां आपको यह भी बता दूं यह इन्टरव्यू  काल्पनिक आधार पर किया गया है।इन्टरव्यू के जवाब रोहित के अंतिम पत्र पर आधारित हैं। यह सब मैने इसलिए लिख दिया क्योकी आज कल लोगो की भावनाए इतनी नाजुक और नंगी हो गयी है की कोई भी उन्हें ठेस पहुंचा देता है ।  आपको यह इन्टरव्यू पढ़ने पर बुरा लगे तो माफ किजीएगा अब वक्त आ चुका है कि हम अपनी गहरी नींद से जाग जाये। इस इन्टरव्यू के सवाल वैसे ही है जैसे आप रोजमर्रा के टेलीविजन में खोखली हो चुकी पत्रकारीता के सवाल  में देखते है ।
रिपोर्टर का सवाल तो रोहित मरने के बाद आप कैसा महसूस कर रहे हैं ?

रोहित का जवाब- जी , अच्छा और बेहद हल्का मेहसूस कर रहा हूं । अब केवल मै और मेरी आत्मा हैं । हम अब आराम से अपने मन के मुताबिक  अपने चुने हुए विषयो पर बात कर रहै है । यहा कोई और नही है जो मेरे बात करने या किसी विषय पर राय रखने पर मुझे देशद्रोही करार दे दे ।मैं जिंदा रहने से ज्यादा मर कर खुश हूं।
रिपोर्टर का सवाल रोहित आपने आत्महत्या क्यो की ?
रोहित का जवाब- सब शुन्य हो चुका था । मैं खुद के शरीर और रूह के बीच एक खाई महसूस कर रहा था, दुनिया खोखली है ,सब दिखावटी  लोग है जो इस दुनिया में रहते है ।
रिपोर्टर का सवाल-  क्या आप अपने विश्वविधालय में जातिवादी और देशद्रोही गतिविधी कर रहे थे?
रोहित का जवाब- देश में कई ऐसे वर्ग के लोग है जो किसी के भी फांसी के पक्ष नहीं हैं। कई जज से लेकर मशहूर अभिनेता तक फांसी के पक्ष में नहीं है। हम लोग भी उसी पक्ष का एक हिस्सा थे । देश आजाद है हमें अपनी राय रखने का पुरा अधिकार है तो फिर हम देशद्रोही कैसे हो गये ? अफजल गुरू के वक्त भी कई नेताओ ने फांसी का विरोध किया ये लोग उन्हे देशद्रोही करार क्यो नहीं देते ?
रिपोर्टर का सवाल - तो आप मानते है कि याकूब को गलत सजा दी गयी?
रोहित का जवाब-  नहीं , मैं आपको बता दू कि हम फांसी देने के खिलाफ है किसी भी गुनहगार को फांसी न दी जाये हम इसके पक्ष में हैं। फांसी के अलावा कोई और भी सजा दी जा सकती हैं ।
रिपोर्टर का सवाल- आप दलित है क्या इस वजह से आपके साथ ऐसा किया गया ?
रोहित का जवाब- मैं ऐसा नहीं मानता, मेरा तो बचपन ही एक त्रासदी की तरह गुजरा है और बिल्कुल खाली । बचपन से लेकर अबतक ऐसा ही हुआ है और मेरे से पहले भी यही होता आया है ।
रिपोर्टर का सवाल- क्या आपको मालूम था कि आपके मरने के बाद लोग कैसे रिएक्ट करेंगे ?
रोहित का जवाब- हां शायद मुझे मालूम था कि मेरे मरने पर लोग मुझे कायर कहेंगे, वो यह भी कहेंगे की एक एजेंडे के तहत मै हिन्दुओ को विरोध करता था लेकिन  यकिन मानिए मुझ इन बातों से फर्क नहीं पड़ता । मै इन चीजो का आदी हो चुका हूं और उनके सोच पर अब मुझे तरस आता हैं।
रिपोर्टर का सवाल- आपको सरकार से शिकायत है ?
रोहित का जवाब- नहीं , मुझे अब किसी से शिकायत नहीं है । मैं क्या हम सब इस व्यवसथा के आदि हो चुके है जहां लोकतत्र के नाम पर सरकार जनता पर ही हुकुमत करती है ।
रिपोर्टर का सवाल-  आपने जान देने से पहले अपने परिवार के बारे में नहीं सोचा ?
रोहित का जवाब सब कुछ सोच समझ कर किया । हर पहलु के बारे में सोचा और जब मन से शुन्य हो गया तो मुझे जीने से ज्यादा मरने में खुशी दिख रही थी । तो एक पत्र लिखा और फिर ....
रिपोर्टर का सवाल- आप 13 दिनों तक खुले आसमान में सोते रहे इसके पहले आप और आपके साथियो पर करावाई के लिए सरकार व्दारा लगातार पत्र लिखे जा रहे थे उसपर कोई टिप्पनी करना चाहेगे ?  
 
रोहित का जवाब-  नही, जिसे जो करना  अच्छा लगा उसने वो किया ।यहां सभी दिखवटी लोग है मै किसी से कुछ नही कहुंगा ।
रिपोर्टर का सवाल- आपके दोस्त और आपसे हमदर्दी रखने वाले  लोग सड़क पर है ?
रोहित का जवाब- मुझे नहीं मालूम था कि इतने लोग मेरे लिए खड़े होगे । लेकिन मुझे इस बात का दुख है कि ये लोग अगर शुरू से इतने जागरूक होते और लगातार आवाज उठाते तो किसी दलित को शोषित ही न होना पड़ता ।
रिपोर्टर का सवाल- अब आप मर चुके है लेकिन आपके मरने पर खूब राजनीति हो रही है?
रोहित का जवाब अच्छा है शायद मेरे बाद मेरे किसी दोस्त को ऐसा कदम उठाने की जरूरत न पड़े लेकिन इसकी उम्मीद बहुत कम है ?
रिपोर्टर का सवाल तो आप....(रोहित बीच मे रिपोर्टर को रोकते हुए )
रोहित- आप भी तो मेरे मरने के बाद आये शायद आपको इसी का इंतजार था कि कोई दलित मरे और फिर इसकी मौत पर जी भर कर तमाशा किया जा सके ...
(
रोहित गायब हो जाते है )
रिपोर्टर का मुहं लटक जाता है और फिर वह भी ....

Saturday, July 4, 2015

जुलाई अंक- नई क़लम- उभरते हस्ताक्षर

शुक्रिया लेखक मित्रो, अग्रज लेखकगण , बहुत जल्दी में इस अंक को निकाला है. आप सब की मेहनत की वजह से जुलाई अंक आपकी आँखों के सामने है. आपकी अपेक्षाओं पे कितना खरा उतरा ...ये आने वाला वक़्त बताएगा...आप इस लिंक पे जा के Downlod कर सकते हैं. आप चाहें तो Newshunt App से भी पढ़ सकते हैं.

वक़्त भी क्या अजीब शै है, कितने जल्दी बिना पंखों के उड़ता चला जाता है और हम मुट्ठी में रेत की मानिन्द बाँधने की कोशिश ही करते रहते हैं. साल-दर-साल गुजरते चले जाते हैं. लेकिन इस दौड़ते वक़्त के साथ जो साथ-साथ चलता है, वो आपके अहसास , जो बाद में सुखन कहलाता है. चलता चला जाता है और क़लम अपना सफ़र तय करती चली जाती है . क़लम धीमी जरूर होती है . लेकिन थमती नहीं है , रूकती नहीं है , अनवरत चलती रहती है. सच तो ये है क़लम , सुकून जो देती है न ..
आगे पढ़ें यहाँ से ---


जुलाई अंक- नई क़लम- उभरते हस्ताक्षर

Monday, June 29, 2015

जुलाई अंक के लिए रचनाएँ आमंत्रित

***************जुलाई अंक के लिए रचनाएँ आमंत्रित **********
प्रिये मित्रो,
नई कलम - उभरते हस्ताक्षर .. का जुलाई अंक आना है. इसके लिए मैं आप सबसे रचनाएँ आमंत्रित कर रहा हूँ. आपको पता है ये साहित्यिक पत्रिका है. आपको बता कर हमें ख़ुशी हो रही है. अब ये पत्रिका आप Newshunt से भी प्राप्त कर सकते हैं . और Android User इसे Newshunt App से भी ले सकते हैं. बहुत ही मामूली प्राइस पर.
लेखक मित्रों से अनुरोध है हमेशा की तरह आप जैसा साथ देते चले आये हैं. इस बार भी देंगे .. आप सब से ग़ज़लें , नज़्में, कवितायेँ, संस्मरण, आलेख और एक चिट्ठी कॉलम के तहत एक चिट्ठी जिसे हम प्रकाशित करेंगे. ताकि खतो-किताबत जिंदा रहे. बहस का मुद्दा इस बार हमने शिक्षा को बनाया है. आप इस पर हमें अपने लेख भेज सकते हैं. रचनाएँ इस Mail Id पर भेजें 

nai.qalam@gmail.com, shahid.ajnabi@gmail.com
इंतज़ार में
संपादक

Friday, May 22, 2015

मुझे रंडी के कोठे और पीर की मज़ार इन दो जगहों से बहुत डर लगता है- मंटो - अख्तर अली

अखतर अली का आलेख - मंटो - नामी कहानियों का बदनाम कथाकार 

साभार - रचनाकार

 

आज आपको रायपुर से - जनरल मैनेजर साहब - अख्तर अली साहब का आलेख सौंप रहा हूँ.... मंटो पे आप भी अपना रुख जाहिर करें. इंतज़ार रहेगा.
मुझे रंडी के कोठे और पीर की मज़ार इन दो जगहों से बहुत डर लगता है क्‍योंकि पहली जगह लोग अपनी औलाद से और दूसरी जगह अपने खुदा से पेशा करवाते हैं।
- मंटो की एक कहानी से
मंटो जन्‍मशताब्‍दी वर्ष
मंटो - नामी कहानियों का बदनाम कथाकार

उसने अपनी कहानियों से पूरे समाज में हंगामा मचा दिया था , जिसके लिखे को पढ़ कर लोग तिलमला उठे ,लोगों के तन बदन में आग लग गई , वे उसे बर्दाश्‍त नहीं कर सके। उसने जितनी उम्‍दा कहांनियाँ लिखी लोगों ने उस पर उतने ही गन्‍दे इल्‍ज़ाम लगाये। उसके खिलाफ मुकदमे दायर किये गये , उसे पागल करार दिया गया, फिर भी मंटो लिखता गया, जी हां उन नामी कहानियों के बदनाम कहानीकार का नाम मंटो था , सआदत हसन मंटो।

आज जब उस महान कहानीकार को इस दुनियाँ जिसने उसे चैन से जीने नहीं दिया से रूखसत हुए पैंतालीस साल से भी ज्‍यादा वक्‍त गुज़र चुका है तब मैं आज के हालात में मन्‍टो की कहानियों पर नज़र ड़ालता हूं और यह जानने की कोशिश करता हूं कि उसने ऐसा क्‍या लिख गया जो लोगों को नागवार गुज़रा और लोगों ने उसका जीना हराम कर दिया! मैं उसकी कहानियाँ बुराइंयां ढूंढने के इरादे से पढ़ता हूं और उसकी कलम का कायल होता जाता हूं। वाह , ज़ालिम की कलम में क्‍या जादू है, अपनी बात कहने का क्‍या जबरदस्‍त तरीका है। उसकी कहानी पढ़ कर एक बात खास तौर पर सामने आती है कि मन्‍टो ने कहानियों में कुछ नहीं कहा बल्‍कि कुछ खास कहने के लिये कहानियाँ लिखी।

हालांकि मै बहुत बड़ा विद्धान नहीं और न ही आज तक मंटो को पूरी तरह समझ ही पाया हूँ लेकिन चूंकि मै भी इसी विधा से जुड़ा हूँ इसलिये इसमें कुछ दखल अंदाज़ी कर सकने की क्षमता रखता हूँ। मैं यह पूरे आत्‍मविशवास के साथ कह सकता हूँ कि मन्‍टो को पागल कहने से बढकर कोई पागलपन हो ही नहीं सकता। अगर कोई कहता है कि मन्‍टो की कहानियाँ अश्‍लील है तो मेरा कहना है कि अश्‍लील उसकी कहानी नहीं बल्‍कि पढ़ने वालो का दृश्‍टिकोण है। आखिर अश्‍लीलता का मापदंड़ क्‍या है? यदि मन्‍टो जो लिखा वह अश्‍लील है तो जो कालिदास ने लिखा वह क्‍या है?

ग्‍यारह मई उन्‍नीस सौ बारह को समराला ( जिला लुधियाना ) में पैदा हुए मन्‍टो जिन्‍होने सात साल की उम्र मे जलियावाला बाग का खूनी हत्‍याकांड़ देखा , युवा अवस्‍था में देश का विभाजन, उस समय के रक्‍तपात को देखा , मन्‍टो जिसने रूसी कहानी के रूपांतर से कथा साहित्‍य की दुनियाँ में कदम रखा - जिनकी कहानियाँ जब मैं , मैं जो इस दुनियाँ में जब आया तब मेरे इस प्रिय लेखक को इस दुनियाँ से सिधारे पांच वर्ष हो चुके थे , आज पढ़ता हूँ तो एैसा महसूस होता है कि मन्‍टो ने जो लिखा वह कहानी नहीं बल्‍कि आंखो देखी घटना का चित्रण है जिसे अफसाने का नाम दे दिया गया है। बस ज़माने को मन्‍टो का यही चित्रण पचा नहीं, क्‍योंकि आज जिसे हम कहानी कहते हैं वह मन्‍टो की कहानी नहीं बल्‍कि ज़माने को दिखाया गया मन्‍टो का वह आईना है जिसमे ज़माने को अपना असली चेहरा नज़र आ गया। आप मन्‍टो की कहानी सिर्फ एक बार पढ कर मत छोडि़ये बल्‍कि दूसरी और तीसरी बार भी पढि़ये मेरा दावा है आप यह अवश्‍य स्‍वीकार करेगे कि कहानी का कथानक लेखक की कोरी कल्‍पना नहीं बल्‍कि उसका भोगा गया यथार्थ है , दिल पर खाया गया ज़ख्‍म है।

मन्‍टो की विवादग्रस्‍त कहानी ““खोल दो“ इंसानी दरिन्‍दगी का वास्‍तविक रूप है , इसकी नायिका सकीना मन्‍टो की कल्‍पना नहीं बल्‍कि विभाजन के समय का कटु सत्‍य है , जो इस कहानी को अश्‍लील रचना कहता है तो क्षमा कीजियेगा मेरा मानना है कि उसे अच्‍छे साहित्‍य को समझने की तमीज़ नहीं है। पाठकों का यह कर्तव्‍य होता है कि वे लेखक की भावनाओ और उसके दृश्‍टिकोण को ध्‍यान में रखते हुए उसकी कृति को पढ़े़, कथा खत्‍म होने पर पुस्‍तक भले बंद कर दे किन्‍तु मस्‍तिष्‍क के द्धार खुले रखे। क्‍योंकि मन्‍टो जैसे रचनाकार न तो अनावश्‍यक शब्‍द लिखते हैं न शब्‍दों का अनावश्‍यक प्रयोग करते हैं , मन्‍टो के शब्‍द पाठको की आंखो के रंगमंच पर दृश्‍य बन कर नृत्‍य करने लगते हैं। मन्‍टो के शब्‍द कही तीर कही खंजर कही ज़हर तो कही अंगार बन जाते हैं।

अपनी एक कहानी में मन्‍टो लिखते हैं - मुझे रंडी के कोठे और पीर की मज़ार इन दो जगहों से बहुत डर लगता है क्‍योंकि पहली जगह लोग अपनी औलाद से और दूसरी जगह अपने खुदा से पेशा करवाते हैं। मंटो का यह आक्रमक तेवर समाज झेल नहीं पाया और चंद मुल्‍ला , पंडि़त और नेताओं के गिरोह ने उसका जीना दुश्‍वार कर दिया , किन्‍तु जिस प्रकार घायल शेर और ज्‍यादा खतरनाक हो जाता है उसी प्रकार पीडि़त कलम और अधिक विद्रोही हो गई , इसी का परिणाम है कहानी “शाहदौले के चूहे” जो धर्मांधता के मुंह पर मारा गया मन्‍टो का वह तमाचा है जिसकी झनझनाहट समाज आज तक महसूस कर रहा है। तथाकथित हाई सोसायटी के साफ सुथरे कपड़े पहनने वालों की गंदी मानसिकता को बेनकाब करने से भी मन्‍टो साहब नहीं चूके और चंद लाईनों में ही उनका चरित्र चित्रण कर दिया , बानगी देखिये -
आपकी बेगम कैसी कैसी है?
यह तो आपको मालूम होगा , हां आप अपनी बेगम के बारे में मुझसे दरयाफ्‌त कर सकते हैं।
एक अन्‍य लघु कथा में मंटो के पात्र जो संवाद कहते हैं ऐसा लिखने का दम तो बस मंटो की कलम में ही था -
यार तुम औरतों से याराना कैसे गांठ लेते हो?
याराना कहां गांठता हू , बकायदा शादी करता हूं।
शादी करते हो?
हां भई, मैं हराम कारी का कायल नहीं। शादी करता हूं और जब उससे जी उकता जाता है तो हक ए महर अदा कर उससे छुटकारा हासिल कर लेता हूं।
यानि?
इस्‍लाम जि़न्‍दाबाद।
मन्‍टो विसंगतियों और उसके जिम्‍मेदार लोगों पर लगातार प्रहार किये जा रहा था ,खराबी को मुंह छुपाने के लिये भी जगह नहीं मिल रही थी। बहुत हाथ पैर मारने के बाद अंततः खिसियाई बिल्‍ली खम्‍बा नोचने लगी और साहित्‍य के क्षेत्र में यह बात ज़ोर पकड़ने लगी कि मन्‍टो की कहानियों में अश्‍लीलता भरी हुई है , मन्‍टो गंदा लेखक है। यह सच भी है कि यदि कोई अश्‍लील दृश्‍टिकोण लिये मन्‍टो की कहानियां पढेगा तो कुछएक कहांनियों में उसे अश्‍लीलता की झलक मिल जायेगी। यहां इस बात पर ध्‍यान दिया जाये कि मैंने दो बात कही है एक “अश्‍लील दृश्‍टिकोण” और दूसरी ” कुछ एक कहानी ”।

किन्‍तु इन्‍हीं कहानियों को जब एक समझदार और जागरूक पाठक पढ़ेगा तो इसे कलम का जादू , कलम का कमाल , लेखक की योग्‍यता जैसे अलंकरणों से सुसज्‍जित करेगा , क्‍योंकि उसमें इस बात को समझने की तमीज़ होगी कि इसमें लेखक का उद्धेश्‍य अश्‍लीलता का वर्णन नहीं बल्‍कि समाज के चारित्रिक पतन का चित्रण है। दरअसल मंटो ने अपनी कलम के साथ समझौता नहीं किया। यदि उसकी कहानी का पात्र वैश्‍या का दलाल है तो मंटो ने उसके मुंह से उसी स्‍तर के शब्द कहलवाये हैं जिस स्‍तर का वह आदमी है।

मंटो ने शब्‍दों का इस्‍तेमाल करते समय जि़न्‍दगी की इस हकीकत को ध्‍यान में रखा है कि जिस मुंह में हराम की रोटी जायेगी उस मुंह से शराफत के अल्‍फाज़ निकल ही नहीं सकते ,अगर मंटो की कथा में कोई जवान लड़का नहाती हुई लड़की को छुप कर देख रहा है तो स्‍वाभाविक है उस समय उसके दिल में देशभक्‍ति के विचार तो नहीं आयेगे और न ही समाज सेवा के। उस समय उसके मन में जो विचार पैदा होंगे उसकी का मन्‍टो ने पूरी ईमानदारी के साथ वर्णन किया है ,जो लिखा वही वास्‍तविकता है , किन्‍तु लेखक की योग्‍यता के कारण वर्णन इतना जीवंत बन पड़ा है कि पढ़ते समय पाठकों की आंखों में एक एक शब्‍द दृश्‍य बन कर खड़ा हो जाता है।

अब इसे लिखने वाले की काबिलीयत मानना चाहिये था लेकिन लोगों ने इसे उसका ऐब मान लिया और इस बात को पूरी तरह नज़र अंदाज़ कर दिया कि वह कहानी किस बिन्‍दु पर जाकर खत्‍म होती है और क्‍या बात कहती है? मन्‍टो की कहांनियो की यह खासियत है कि वे तो खत्‍म हो जाती है लेकिन पढ़ने वालों के दिमाग में सैकड़ों सवालात पैदा कर जाती है , खास कर ”खोल दो“,”ठंड़ा गोश्‍त“, दो कौमें , शहदौले के चूहे ,कहानियो में तो यह बात साफ तौर पर उभर कर आती है कि इनमें जो लिखा उसे तो हर सामान्‍य पाठक पढ़ लेता है लेकिन समझदार पाठक उसे भी पढ़ लेता है जिसे मन्‍टो ने शब्‍दों में नहीं ढाला , उन अलिखित वाक्‍यों को भी पढ़ लेता है जिसे कहने के लिये मन्‍टो ने पूरी कहानी लिखी। मंटो शब्‍दो का इस्‍तेमाल कितनी खूबसूरती से करते हैं इसका एक बेहतरीन नमूना उनकी कहानी ” सड़क के किनारे “ में देखने को मिलता है। नायिका को गर्भवती होने का एहसास होता है , उस एहसास को मन्‍टो ने शब्‍दो में यूं बयान किया है -
मेरे जिस्‍म की खाली जगहें क्‍यों भर रही है? ये जो गड़ढे थे किस मलबे से भरे जा रहे है? मेरी रगो में ये कैसी सरसराहटें दौड़ रही है? मैं सिमटकर अपने पेट में किस नन्‍हे से बिन्‍दु पर पहुंचने के लिये संघर्ष कर रही हूं? मेरे अंदर दहकते हुए चूल्‍हों पर किस मेहमान के लिये दूध गर्म किया जा रहा है? यह मेरा दिमाग मेरे ख्‍यालात के रंग बिरंगे धागों से किसके लिये नन्‍ही मुन्‍नी पोशाकें तैयार कर रहा है? मेरे अंग अंग और रोम रोम मे फंसी हुई हिचकियां लोरियों में क्‍यों बदल रही हैं? यह मेरा दिल मेरे खून को धुनक धुनक कर किसलिये नर्म और कोमल रजाइयां तैयार कर रहा है? मेरे सीने की गोलाईयों में मस्‍जिदों के मेहराबों जैसी पाकीज़गी क्‍यों आ रही है?
मंटो जिसने सारी उम्र सिर्फ लिखा है और इतना ज्‍यादा लिखा है कि उसके सम्‍पूर्ण साहित्‍य का यहां उल्‍लेख नहीं किया जा सकता। हो सकता है उसकी अनगिनत रचनाओ में कुछ एक कथ्‍य या शिल्‍प की दृष्‍टि से कमज़ोर हो , किन्‍तु उन चंद रचनाओं से मन्‍टो का सम्‍पूर्ण रचना संसार को आंकना न्‍यायसंगत नहीं होगा और उस अश्‍लीलता का आरोप लगाना उसकी योग्यता को झुठलाना होगा। यदि मन्‍टो का दृष्टिकोण अश्‍लील होता तो उसकी कलम टोबा टेक सिंह , खुदा की कसम , मम्‍मी , काली शलवार , ये मर्द ये औरतें , रत्‍ती माशा तोला , जैसी बेहतरीन कहानियाँ न रच पातीं। जिन्‍हें मन्‍टो की कलम परेशान करती रही उन्‍हें मन्‍टो ने स्‍वयं कहा है कि -
ज़माने के जिस दौर से हम गुज़र रहे है अगर आप उससे वाकिफ़ नहीं तो मेरे अफसाने पढि़ये और अगर आप इन अफसानों को बरदाश्‍त नहीं कर सकते तो इसका मतलब है कि ज़माना नाकाबिले बर्दाश्‍त है , मेरी तहरीर में कोई नुक्‍स नहीं। जिस नुक्‍स को मेरे नाम से मनसूब किया जाता है वह दरअसल मौजूदा निज़ाम का नुक्‍स है। मैं सोसायटी की चोली क्‍या उतारूंगा वो तो है ही नंगी।
- - - - - - -
अखतर अली
फ़ज़ली अर्पाटमेंट
आमानाका
रायपुर ( छत्‍तीसगढ़ )
मो़ 9826126781

Monday, December 22, 2014

मुझे बहुत कुछ कहना है.

मन की बात :-

हमारे भारतीय परिवेश में लड़कियों के लिए शादियाँ किसी जुए से कम नहीं होती. अधिकतर तो हार ही जाती हैं ये जुआ, बाकी बची हुई जीत के मुगालते में ख़ुशी ख़ुशी जिंदगियां निकाल लेती हैं. शादी का अमूमन अर्थ हमारे यहाँ लड़की नाम की बूँद का पति और उसके परिवार वालों रूपी महासागर में विलय हो जाना ही है. जिसे आसान शब्दों में कहा जाए तो खुद का अस्तित्व खोना. एक फला-फूला वृक्ष जड़ों समेत उखाड़ कर किसी और आँगन में प्रतिरोपित करने का ये सिस्टम कई बार समझ से बाहर होता है.

ख़ास तौर से तब जब ना पनपने की सूरत में कोई और आँगन ढूँढने का या पुराने गुलशन में लौट आने का विकल्प उसके पास उपलब्ध ना हो. ऐसे किसी विकल्प के बारे में सोचना भी लड़कियों के लिए चारित्रिक हमले को न्यौता देने के बराबर है. कुल मिला कर हमारी सामाजिक मशीनरी का एक एक पुर्जा इस बात पर दृढ-प्रतिज्ञ दिखाई देता है कि लड़कियां अपना अस्तित्व मिटा कर किसी और जूते में अपने पैर फिट कर लें. इस अपेक्षा से इतनी ज्यादा चिढ़ नहीं होती बशर्ते कि उम्मीदों का ये ट्रैफिक एकतरफा ना होता.

 खैर, फिलहाल तो इस समस्या का ( जिसे समस्या ना मानना भी एक बड़ी समस्या है ) कोई हल दिखाई नहीं देता. कोई अल्टरनेटिव नहीं होने की वजह से इसे चुपचाप कबूलने के सिवा और कोई चारा नहीं. कई लोगों को मेरी ये बातें बेहद अजीब, डिप्रेसिंग और गैर-जरुरी लग रही होंगी. ख़ास तौर से तब जब एक हफ्ते बाद मेरी खुद की शादी है. लेकिन जहाँ तक मैं समझती हूँ अपनी बात कहने के लिए मेरे पास ये शायद आखिरी मौका है. अभी नहीं कहा तो शायद कभी नहीं कह पाउंगी. आप सब लोगों ने मेरी बातें अब तक बेहद संजीदगी से सुनी हैं. एक आखिरी बार मैं चाहती हूँ कि आप तवज्जों से मुझे सुनें. लम्बा या बोरिंग लगे तब भी.

मुझे बहुत कुछ कहना है.

मैं शुरू से शुरू करती हूँ. दो साल हुए मुझे फेसबुक पर. मेरी ज़िन्दगी को बेहद आसानी से दो भागों में बांटा जा सकता है. एक वो तेईस साल जो मैंने शिक्षा के लिए परिवार वालों से लड़ते भिड़ते, किताबों से ज़बरन उन्सियत बनाते और दुनिया को समझने की नाकाम कोशिशें करते हुए गुजारें. और दूसरी तरफ वो दो साल जो इस चेहरे की किताब पर आ कर खुद को डिस्कवर करते, अपने मूल्यों के प्रति संजीदा होते और सही-गलत को उनकी प्रचलित परिभाषाओं के परे जा कर समझते हुए बिताये.

एक रुढ़िवादी मुस्लिम परिवार में जन्म लेने के कारण लोगों से मेलजोल पे लगी पाबंदियों के बीच जीते हुए कभी मौका ही नहीं मिला ये समझने का कि इस दुनिया का आम आदमी किस तरह सोचता है. इस मामले में ये फेसबुक बेहद क्रांतिकारी टूल साबित हुआ मेरे लिए. इस की सबसे बड़ी खासियत यही है कि अमूमन लोगों की थॉट-प्रोसेस यहाँ स्पष्ट रूप से नज़र में आ जाती है.

और इसी वजह से अपने आसपास के समाज का एक कलेक्टिव जजमेंट आसानी से हासिल हो जाता है. शुरू शुरू में सिर्फ नज्में/ग़ज़लें शेयर करने में व्यस्त रहा करती थी मैं. फिर मित्र अवनीश कुमार जी के कहने पर खुद भी कुछ लिखना शुरू किया. अपना लिखा पसंद करते लोग देख कर सुखद हैरानी होती थी कि क्या मुझे सच में ही लिखना आता है ? अब तक मैं सिर्फ एक पाठक रही थी. कलम पकड़ने का तजुर्बा नया था. लेकिन जब सिलसिला शुरू किया तो रुकी ही नहीं. आप सब ने कदम कदम पर हौसला-अफजाई की. तारीफ़ में पीठ ठोंकी तो गलतियों पर चेताया भी. आहिस्ता आहिस्ता आप सब की नज़रों में मेरा वजूद आकार लेता चला गया. Nobody से Somebody तक के इस सफ़र में बेशुमार नये रिश्तें मिलें. बेहद अनमोल.

फिल्में, किताबें, धर्म, राजनीति हर विषय पर मैंने जी भर के लिखा. सार्थक था या नहीं पता नहीं लेकिन आप सबने खूब पसंद किया. मुझे इस एहसास से लबालब भर दिया आप लोगों ने कि मुझे भी कुछ आता है. मैं इस दुनिया की भीड़ बढाने वाली एक नग मात्र नहीं हूँ. बल्कि मेरा भी एक वजूद है. जिसका एहतराम किया जाता है. जब सरासर अनजान लोग मेरे इनबॉक्स में आ कर मुझ से मशवरा मांगते हैं कि दीदी मुझे क्या करना चाहिए तो मुझे हैरानी होती है अपने दोहरे व्यक्तित्व पर. ये ज़ारा उस ज़ारा से कितनी अलग है जिसकी राय को एहतराम देना तो दूर कोई पूछना भी जरुरी नहीं समझता असली दुनिया में. बेहद परेशान करता रहा है ये सवाल मुझे कि क्या मेरे अन्दर सचमुच वो काबिलियत है कि लोग अपनी परेशानियों को मुझ से शेयर करें और मेरी राय मांगे. अगर हाँ तो मैं अपनी इस सलाहियत से अपने परिवार को क्यूँ नहीं मुतमईन कर पाईं कभी ?

आपमें से कुछ एक ख़ास मित्रों को छोड़ कर बाकी किसी को नहीं पता होगा कि मैंने सिर्फ बीए तक की पढ़ाई की है. वो भी प्राइवेट. कॉलेज की शक्ल नहीं देखी कभी. एक अदद इन्टरनेट कनेक्शन लगवाने के लिए मुझे जितना संघर्ष करना पड़ा उसकी मिसाल दूसरी न होगी. ज़माने भर में मशहूर ज़ारा के खुद के परिवार वालों को इस बात की भनक भी नहीं है कि उनकी बेटी फेसबुक जैसी सोशल साईट पर है और इतने ज़बरदस्त तरीके से है. और लग जाने पर नतीजा सुखद किसी हाल में नहीं निकलेगा. यही वजह रही कि मेरी वाल पर प्रोफाइल पिक्चर वाला आयताकार टुकड़ा मेरी शक्ल के लिए हमेशा ही तरसता रहा. यही वजह है कि मेरी शादी की ख़ुशी में मुझे गिफ्ट्स देने के लिए बेकरार आत्मीय जनों को मैं अपना पता तक नहीं बता सकी. क्यूँ कि इस ‘ज़ारा खान’ को अपने परिवार के सामने एक्सप्लेन करना नामुमकिन है मेरे लिए. ना सिर्फ नामुमकीन है बल्कि घातक भी. आप सब लोग समझदार हो. अनकही बातें समझ जाने की काबिलियत आपमें यकीनन होगी.

खुद को परदे में रखने की अपनी इस मजबूरी के चलते मुझे कई बार बेहद शर्मिंदगी भी उठानी पड़ी. हमारे फेसबुक पर ये चलन आम है कि गाहे-बगाहे लोगों को फेक घोषित करते रहना. इस राय-शुमारी की चपेट में मैं कई बार आई. विदेश में रहते और एनजीओ के बिजनेस में दखल रखते एक मशहूर कामरेड साहब ने सब से पहले मुझे फेक कहा और मेरे तमाम सवालों को वो इस एक इलज़ाम के आड़ में डक करतें गए. फिर उसके बाद गाहे बगाहे कई जगहों पर मेरी प्रोफाइल का लिंक चेंपते रहे. ऐसे ही एक बार एक महिला की वाल पर जारी ऐसे ही डिस्कशन के बीच मेरी लिस्ट में शामिल Santosh Singh सर ने उनसे वो सवाल पूछ लिया जो मेरी जुबान पर हमेशा रहा करता था. वो ये कि नफरत भरें पोस्ट्स लिखने के लिए, धार्मिक उन्माद फैलाने के लिए या किसी राजनीतिक विचारधारा के अंध समर्थन के लिए तो फेक अकाउंट का औचित्य समझ में आता है लेकिन सार्थक लिखने के लिए क्यूँ ? उस एक सवाल के लिए मैं संतोष सर की कितनी एहसानमंद हूँ ये मैंने उन्हें आज तक नहीं बताया. आज बता रही हूँ. क्यूँ कि आज नहीं बताउंगी तो ये बात मेरे साथ ही चली जायेगी. शुक्रिया संतोष सर, एक निहायत ही सेंसिबल सवाल करने के लिए. खैर, इस तरह का ये एकाध ही हादसा हुआ हो ऐसी बात भी नहीं है.

एक और दिल दुखाने वाले घटनाक्रम में मेरे वजूद को मानने से उस शख्स ने इंकार कर दिया जो शुरूआती दिनों से मुझ से परिचित था और इनबॉक्स में मुझ से घंटों बतियाता था. मैंने उसे भी हलाहल समझ के पी लिया. इस तरह की सब से बड़ी और आत्मविश्वास को चकनाचूर करने वाली घटना तब हुई जब एक बेहद ही मशहूर वाल पर मेरे नाम से पोस्ट डाली गई और बाकायदा मेरे वजूद के चिथड़े उड़ायें गए. ना सिर्फ उन्होंने बल्कि उनके दर्जनों समर्थकों ने बिना मुझे जाने-पहचाने बेहद शानदार शब्दों में मेरी इज्जत-अफजाई की. ये बात अलग है कि उसके

फ़ौरन बाद उनमें से कईयों ने मुझे रिक्वेस्ट भेजी जिसे कि मैंने स्वीकार भी कर लिया. वो रात बेहद ही भयानक थी मेरे लिए. एक पल को आँख न लगी. फेसबुक छोड़ देने का पक्का निर्णय कर लिया था उस रात. लेकिन सुबह फेसबुक खोलने पर कुछ अज़ीम हस्तियों ने मेरी बेहद दिलजोई की. बहुत सी बातें समझाई. ना जाने का आग्रह किया. और मैं बनी रही. यहाँ ये कहना बेहद जरुरी है कि उन जनाब से आगे मेरे रिश्ते बेहद अच्छे हो गए और उस प्रलयंकारी पोस्ट की कडवाहट का नामोनिशान नहीं रहा. जिसकी मुझे बहुत ख़ुशी है.
हमारे रुढ़िवादी समाज और धार्मिक कट्टरता का शिकार मैं कई बार मजहबी पाबंदियों के प्रति तल्ख़ हुई तो इसकी वजह मेरा भोगा हुआ यथार्थ ही था. एक संकीर्ण मानसिकता से मेरा हुआ नुकसान मुझे मुखरता से लिखने के लिए जैसे उकसाता था. फिर भी मैंने भरसक कोशिश की कि मेरा लेखन महज़ कोसाई का नमूना ही बन कर ना रह जाए.

मैंने कोशिश की कि नकारात्मकता से पॉजिटिविटी की तरफ के सफ़र की मैं फ्लैग बियरर बनूँ. यहाँ ये सब लिखने के पीछे मेरा मकसद ये कतई नहीं है कि मैं अपने आप को पीड़ित घोषित कर के हमदर्दियां बटोरूँ. बल्कि मुझे सच में लगता है कि लड़कियों के सपनों की हत्या हमारे समाज के ब्लड सिस्टम में घुला एक बेहद खतरनाक वायरस है. बेहद सामान्य बात है ये. और इसका सामान्य होना ही इसका सब से भयावह पक्ष है. रिवाज ही नहीं है हमारे यहाँ ये मानने का कि लडकियां लड़कों जितनी ही काबिल हो सकती हैं या संसाधनों पर, अपनी दुनिया खुद बनाने के लिए जरुरी मौकों पर उनका भी समान अधिकार है. ऐसा क्यूँ है मैं नहीं जानती. लेकिन ऐसा है इससे शायद ही कोई इनकार करने का साहस करे. हाँ, अपवाद हर जगह होते हैं. यहाँ भी हैं. लेकिन मैं एक बड़े वर्ग की बात कर रही हूँ. ख़ास तौर से मेरे अपने मजहब की लड़कियों की.

मेरा दिल लरज़ता है ये देख देख कर कि ज्यादातर मुस्लिम लड़कियों की जिंदगियां सूट का कलर डिस्कस करने में, मेकअप की फ़िक्र में या शादी की अनिश्चितता की सूली पर लटके लटके ही ख़त्म हुई जा रही है. सामयिक राजनीति, देश-दुनिया इन के बारे में उनकी जानकारी जीरो है. दुनिया के महान लोकतंत्र कहलाने वाले हमारे मुल्क का एक बड़ा तबका इसकी निर्माण प्रक्रिया में शामिल तो क्या इससे वाकिफ भी नहीं है. हम इतिहास पर लड़ते भिड़ते रहते हैं. हमारा वर्तमान कितनी सियाह कालिखें अपने चेहरे पर पोते बैठा है इसकी हमें परवाह ही नहीं. ये ऐसा क्यूँ है ये मैं नहीं जानती. इसे कैसे बदला जाएगा इसका भी मुझे दूर दूर तक कोई इमकान नहीं. लेकिन ये गलत है ऐसा मेरा दृढ विश्वास है. बल्कि गलत नहीं गुनाह है.

अब मेरी शादी हो रही है. हमारा समाज बेटियों के मुकाबले बहुओं के लिए कितना सहनशील है ये मुझे अलग से बताने की जरुरत नहीं. और इसीलिए मुझे गारंटी है कि मेरे फेसबूकिया जीवन का ये अंत है. मुझसे कई लोगों ने ये सवाल किया कि इस दुश्चक्र से निकलना इतना मुश्किल क्यूँ है तुम्हारे लिए ? ख़ास तौर से तब जब फेसबुक के माध्यम से मदद करने वाले इतने हाथ उपलब्ध है ? मेरा जवाब ये है कि मैं जानती हूँ के लोगों के ज़हनों को जकड चुकी सामाजिक सीमायें और मजहबी कट्टरता जब अपनी औकात पर उतरती है तो सर्वनाश पर उतारू हो जाती हैं. और मैं खुद को दाँव पर लगाने का हौसला तो कर सकती हूँ लेकिन अपने कुछ गिने चुने आत्मीय जनों के लिए जानलेवा दुश्वारी खड़ी करना मेरे लिए असंभव है. वैसे भी ये सिर्फ एक ज़ारा की बात नहीं है. सिर्फ एक ज़ारा की बेहतरी के लिए शायद हम कुछ कर भी लें लेकिन उन हज़ारों लाखों जाराओं का क्या जिनके सपनों का खून करने के हम आप सब गुनाहगार हैं और फिर भी बेशर्मी से जिए जाते हैं. पाश कहा करते थे कि सब से खतरनाक है सपनों का मर जाना.

इस हिसाब से देखा जाए तो हमारा समाज वक्त से पहले क़त्ल कर दिए गए ऐसे सपनों की विशाल कब्रगाह है. वैसे मुझे यकीन है भारत महान क़यामत के दिन तक स्त्री को देवी मानने की अपनी महान परंपरा का निर्वाहन करता रहेगा. दिल में गुबार लिए मैं सिर्फ एक बात कहना चाहती हूँ. अगर समझ आये किसी के तो ठीक है नहीं आये तो भी ठीक. बेटियों को जब तक घर-खानदान की इज्ज़त समझा जाता रहेगा तब तक उनकी औकात एक फर्नीचर पीस से ज्यादा कभी नहीं होने वाली. उसे एक स्वतंत्र अस्तिव मान लेना ही उसके प्रति सच्ची मुहब्बत होगी. और मुझे पूरा यकीन है कि हम उस मुकाम को कभी हासिल नहीं कर पायेंगे.


खैर, लेक्चर बहुत हुआ. मैं ये ऐतराफ करना चाहती हूँ कि आप सब लोगों के साथ मैंने बहुत अच्छा समय गुजारा. मेरे जीवन का ये स्वर्णिम काल था. अनदेखे अनजान लोगों से मुहब्बतें पाना बेहद ख़ास घटनाक्रम था मेरी ज़िन्दगी का. अपने कुछ लिखे पर बड़े बड़े काबिल लोगों की तारीफें पाना बहुत सुकून पहुंचाता था. बेहद सुखद हुआ करती थी ये फीलिंग. अब कभी नहीं आयेगी. टर्मिनल इलनेस की वजह से मौत से नज़रें मिलाते मरीज़ को कैसा लगता होगा ये महसूस कर सकती हूँ इन दिनों.

ये इतना लम्बा लिखना बुझने से पहले फडफडाते हुए दिये समान है और इसीलिए इसमें इतना शोर भी है. मैं लगभग श्योर हूँ कि ये मेरे फेसबूकीया जीवन का अंत है. कोई पुनर्जन्म जैसा चमत्कार हुआ तो बात दूसरी है वरना ये बिछड़ना स्थायी ही मानिए आप लोग.

फेसबुक से दूर जाना कितना कष्टकारी है ये बयान करने के लिए मैं अगर सारी रात भी लिखती रहूँ तो भी कम है. मेरा तो पूरा वजूद ही फेसबुक की देन है. इससे बिछड़ना ऐसे ही है जैसे ज़हनी तौर पर मर जाना. जब भी कभी कोई नई चीज़ होगी, किसी नेता का बेतुका बयान आएगा, कोई अच्छी किताब पढूंगी, फिल्म देखूंगी तो उस सब के बारे में लिखने के लिए मेरी आत्मा तक छटपटाती रहेगी. पता नहीं उस भावना को मैं कैसे हैंडल करुँगी. लेकिन मुझे सीखना ही होगा.

अपने आने वाले जीवन में यूँ तो करने को कुछ होगा नहीं इसलिए एक छोटा सा मकसद बना लिया है जबरन. ताकि ज़िन्दगी बिलकुल ही निरर्थक ना लगे. अगर संतान का मुंह देखना नसीब हुआ तो मैं उन्हें एक बेहतरीन इंसान बनाने में अपना आप होम कर दूँगी. जो कुछ भी मुझे आता है उसे उन तक ट्रान्सफर करुँगी. कोशिश करुँगी कि वो उन लोगों में शुमार हो जिन्होंने इस दुनिया को बेहतर बनाने की कोशिशें की है. आप सब दुआ कीजियेगा कि कम से कम इस एक मुहाज पर तो मुझे कामयाबी जरुर जरुर मिले.

 उन चार सौ से ज्यादा लोगों से माफ़ी माँगना चाहती हूँ जिनकी फ्रेंड रिक्वेस्ट आई हुई है लेकिन बिछड़ने की इस बेला में मैं एक्सेप्ट नहीं कर सकी. मेरी पुरानी पोस्ट में टैग सभी आत्मीय जनों से मेरा आग्रह है कि वो अपना पता, फ़ोन नंबर आदि मेरी इस मेल आईडी पर मुझे मेल जरुर जरुर करें. Zaara116@gmail.com .बिलकुल भी ना भूलें. जिन्होंने फेसबुक पर पहले दिया है वो भी. फेसबुक का अकाउंट का क्या है, आज है, कल नहीं और तालिबानियों की वजह से परसों की गारंटी नहीं.

अगर आप लोग भूल गए हो तो एक बार फिर बताना चाहूंगी कि फेसबुक पर आज तक जो भी लिखा वो इस ब्लॉग पर उपलब्ध है.
http://zaara-khan.blogspot.in/
कल आखिरी बार आ कर इसे आज तक अपडेट कर दूंगी.

अंत में सिर्फ यही कहूँगी कि मेरा जर्रा जर्रा आप सब लोगों का शुक्रगुजार है. मैं जहाँ कहीं भी रहूंगी हर एक पल आप लोगों को याद करुँगी. ये आभासी दुनिया मुझे असल दुनिया से ज्यादा भायी थी. इसका क़र्ज़ भी है मुझपर. और मैं एहसान-फरामोश नहीं. मैं एक बार फिर भरे अंतकरण से और नम आँखों से आप सब लोगों से विदाई चाहती हूँ. और हाँ, मेरे ख़ास अजीजों से गुजारिश है कि वे अपनी आँखें ना भिगोये प्लीज. बेटी की बिदाई में भी कोई रोता है भला ? बस मेरे लिए दुआ कीजियेगा कि मेरे संतप्त मन को कभी न कभी करार आये. या फिर मेरी सवाल पूछने की आदत छूट जाए.

सदा मुस्कुराते रहिएगा आप लोग. और इस दुनिया को एक बेहतर जगह बनाने की कोशिश में जुटे रहिएगा. अंत में एक फ़िल्मी गीत की ये पंक्तियाँ हाजिर है हमेशा की तरह,
“साथी यूँ तुम को मिले,
जीत ही जीत सदा
बस इतना याद रहे,
इक साथी और भी था.”
------- आपकी अपनी 'ज़ारा'.

Sunday, April 27, 2014

नई क़लम का पुनः प्रकाशन ( हार्ड कॉपी )

नई क़लम - उभरते परिवार की ख़ुशी आप सब के साथ बाँट रहा हूँ... 14 साल पहले मैंने और मेरे अजीज़ दोस्त दीपक मशाल ने इस पत्रिका को निकाला था..हुआ यूँ , इंजीनियरिंग के चक्कर में मुझे मेरठ जाना पड़ गया और दीपक को. दिल्ली वैज्ञानिक होने के लिए..... उस वक़्त एक अंक निकल पाया फिर गाड़ी.. रुक गयी...

लेकिन साहित्य के लगाओ को कभी भी कम न कर पाया या यूँ कहें न हुआ. होना भी नहीं चाहिए था.. सुकून जो मिलता था, मिलता है.... तो उस सुकून को हम दोनों ने नई कलम- उभरते हस्ताक्षर ब्लॉग बनाकर ये सिलसिला चलता रहा ...आप सब लेखक मित्रों की रचनाएं समय- समय पे मिलती रहीं... और हम उसे नई कलम के मंच पे शाया करते रहे.

आज फिर साहित्य के पहियों की पटरियों पे नई कलम -उभरते हस्ताक्षर दौड़ने को तैयार है.. आपके प्यार की दरकार हमेशा की तरह रहेगी...

नए कलेवर और नयी साज -सज्जा के के साथ फिर से नई क़लम -उभरते हस्ताक्षर आपके हाथों में होगी.. 4 मई 2014 को हम फिर से अपने मेहमानों के बीच उस पौधे में पानी दे रहे हैं...

इसी सिलसिले में में आपसे लेख, व्यंग्य, नज़्म, ग़ज़ल, कवितायें, कहानी , उपन्यास ...कोई साहित्यिक शोध पत्र आपसे भेजने को कह रहा हूँ.. आप सब से उम्मीद है आप हमारा सहयोग करेंगे....वैसे ही जैसे आप इसके ई - संस्करण में करते रहे...

आप हमें अपनी रचनाएँ आज रात तक इस मेल पते पर भेजने का कष्ट करें -

nai.qalam@gmail.com

आपका
शाहिद 'अजनबी' और दीपक 'मशाल'

Friday, April 25, 2014

अपनी आपबीती गुड़िया बक्सर गयी :- जीवंत संस्मरण

वरिष्ठ पत्रकार प्रेम प्रकाश जी का  जीवंत संस्मरण  आपके हाथों में सौंप रहा हूँ.... नई क़लम- उभरते हस्ताक्षर के मंच पे एक बड़े कलमकार का  बड़ा जीवंत संस्मरण  ---

अपनी आपबीती
गुड़िया बक्सर गयी..
............................
आज सुबह-सुबह ही रोने का सामान हो गया.पूरे 8 साल बनारस में रहकर मुझसे 6 साल छोटी मेरी बहन गुड़िया अपने पति और बच्चों के साथ बक्सर शिफ्ट हो गयी.अब,जब कि उसके सकुशल नये शहर और नये घर में पहुँच जाने की सूचना मिल गयी है,तो उसे याद करने बैठा हूँ.पिछले महीने ही जब रवि का ट्रान्सफर मोतिहारी से बक्सर हुआ तभी से उसके बक्सर जाने के चर्चे थे.ऋषभ और कावेरी,उसके दोनों बच्चे बहुत खुश थे.खुश तो गुडिया भी थी,क्योंकि इन 8 सालों में रवि मोतिहारी और वो बच्चों के साथ यहाँ बनारस में अकेले-अकेले ही थे.पिछले एक हफ्ते से उसका यह जाना अम्मा,और हम सब के मन पर बुरी तरह छाया हुआ था.

खुश तो हम सब थे,लेकिन गले में कुछ फंसा हुआ भी हम सभी के अन्दर था.गाँव से अम्मा का फोन आना बढ़ गया था.अम्मा उससे कहतीं कि भईया बनारस में अकेले रह जायेंगे.मुझसे कहतीं कि कैसे रहेगी वो वहां तुम लोगों के बिना.तीन दिन पहले से सामान पैक हो रहा था.यहाँ से आधा किलोमीटर दूर यहीं 'कोनिया' में किराए के घर में रह रही थी गुड़िया.आज सुबह गाडी भी आ गयी 6 बजे ही उसका फोन आया--''भईया,जा रहे हैं हम''.घर से सबको ले-दे के उसके घर पहुंचे तो सामान बाहर आ चुका था.मोहल्ले की 30-40 महिलायें उसे घेरे हुए थीं,और उसकी आँखें लाल.......डभ-डभ....रोये जा रही थी.मुझे देखा तो लिपट गयी......... मुझे लगता है कि उसे 19 साल पहले बाबूजी ने विदा नही किया था.विदा तो उसे आज हमने ही किया है.उन्नीस साल पहले का मंज़र याद करता हूँ,तो ये जो आज गले में 'कुछ'फंसा हुआ है,लगता है ये तभी से ही फंसा हुआ है.दो बड़े भाइयों के बीच अकेली बहन के नाते स्वाभाविक ही बहुत दुलार में पली वो.संयुक्त परिवार होने के नाते हम सभी 8 भाइयों के बीच दो ही बहनें थीं.1994 में गोरखपुर युनिवर्सिटी से ग्रजुएशन कम्पलीट करते-करते बाबूजी उसकी शादी के चक्कर में पड गये थे.

परम्पराएं,रीति-रिवाज और इनके प्रति ग्रामीण मन का मोह कितना सघन होता है,यह एक बार फिर बहुत करीब से देख रहे थे हम.मेरी शादी हो चुकी थी.बीच में एक और बड़े भाई के होने के बावजूद बेटी का ब्याह पहले करेंगे इसके लिए बाबूजी पर बहुत दबाव था.जब भी उसकी शादी का ज़िक्र चलता,हम दोनों भाई बेचैन हो जाते.एक वही तो थी दोनों भाइयों के लिए आकर्षण,मनोरंजन,दुश्मन...सब एक साथ.दुश्मन इसलिए कि बाबूजी तक हम दोनों भाइयों की शिकायतें वही पहुंचाती थी,बाबूजी की सीआइडी इंस्पेक्टर.बचपन में रोज सुबह उठ के हम दोनों भाई उसको पैर छू के प्रणाम करते थे.लक्ष्मी थी न बाबूजी की.सामान्य दुनियादारी से कुछ अलग हट के अपने बच्चों को ज़िन्दगी के मूल्यों की शिक्षा देने वाले बाबूजी की उसकी शादी के लिए जल्दबाजी देखकर हम हैरान थे.ऊपर से उनकी ये बात तो हमारी जान ही निकाल लेती थी कि शादी गाँव से ही करेंगे और गाँव में ही करेंगे.हमारे गाँवों में कई सारी कहावतें होती हैं.जो सामान्य जनजीवन को दिशा भी देती है और उसकी दशा भी बताती हैं,समाज को उत्प्रेरित भी करती हैं,प्रभावित भी करती हैं,सीमित भी करती हैं,दायरे भी खींच देती हैं.ऐसी दो कहावतों का ज़िक्र करूँ----एक बेटी,नौ दामाद....माने एक बेटी के लिए रिश्ता खोजने आपको कितने ही घरों में जाना पड़ता है,टकराना पड़ता है,सालों साल तलाश करनी होती है एक ऐसे इंसान की,जिसके हाथ में अपनी बेटी सौंपकर पिता निश्चिन्त हो सके,मुक्त हो सके.दूसरी कहावत है---बेटी के लिए शादी खोजने में बाप के पाँव के जूते घिस जाते हैं....बाबूजी पर इन दोनो कहावतों का ज़बरदस्त असर था.छुट्टी लेकर गाँव जाते,10-20 गाँव घूमते और शादी तय नही होती.लौट कर बताते तो हम भाई-बहन सब खुश हो जाते.एक बार तो उन्होंने झुंझलाकर अपना जूता निकाला और एक पत्थर पर जोर-जोर से घिसने लगे.यकीन मानिए,उस खुरदुरे पत्थर पर रगड़ खाकर उनका जूता घिस ही तो गया.हम लोग हंस रहे थे,उनसे जूता छीन रहे थे.वे बोले-ना,आज तो इसको घिस के ही मानूंगा,लड़का मिलेगा कैसे नही.लड़का देखने की उनकी कसौटियां भी गज़ब की थीं.एक जगह पहुंचे तो पता चला कि पंडित जी की 40 बीघे की खेती है.4 बीघा चना तो घर के सामने वाले खेत में ही लगा रखा था.बड़ा-सा हवेली जैसा मकान था,दरवाजे पर ट्रेक्टर खड़ा था.बेटियाँ ब्याह दी हैं,बड़ा बेटा शादीशुदा है और नौकरी में है.दूसरा बेटा बाकी है. बेटी के लिए शादी देखते समय हमारे तरफ घर और वर देखते हैं.माने पहले हैसियत उसके बाद लड़का.जबकि मुझे लगता है इसको उलट के देखना चाहिए.पहले वर फिर घर.बाबूजी एकांगी धारा के आदमी नही थे.बेटी बड़ी हो गयी,ये सामाजिक दबाव उनपर भले था,लेकिन दृष्टि उनकी खूब गहरी थी.घर और हैसियत देखकर शादी उनको भा गयी.उन्होंने पूछा-लड़का कहाँ है..?ज़रा बुलाइए.लड़के के पिता ने उत्तर दिया-होगा यहीं कहीं,आता होगा,आ जाएगा.

बात-चीत होने लगी.दान-दहेज,मोल-भाव आदि सारी दुनियादारी तय हो गयी और लगभग 2-3 घंटे बीत गये.बाबूजी ने एकबार फिर पूछा-लड़का आया नही अब तक..?लड़के के पिता परेशान थे,बोले-पता नही,कुछ कह के नही गया,संगी-साथियों के साथ होगा कहीं.आ जाएगा अभी.उनके जवाब से बाबूजी को तसल्ली नही हुई,वे लड़के को देखकर ही लौटना चाहते थे.क्या पता,फिर छुट्टी कब मिले,न मिले.लेकिन करते भी क्या...फिर मिलने का तय करके बाबूजी उठ आये.गाँव से बाहर निकलते समय अगुआ ने दिखाया-देखिये,यही है लड़का.4-6 लड़कों के साथ मुंह में पान घुलाये लड़का मोटरसाइकिल से आता दिखा.बाबूजी अगुआ से बोले..-शादी नही करेंगे.अगुआ का मन धक्क से रह गया.-काहे भईया...?,ऐसा क्या हो गया,..?ऐसी हैसियत वाली शादी मिलती कहाँ है..?अरे,बेटी के भाग जाग जायेंगे.लेकिन उनको जवाब बाबूजी ने नही,बाबूजी की कसौटी ने दिया-भाग जाग नही जायेंगे दुबे जी,बेटी के भाग फूट जायेंगे इस घर में.जिस बाप को 4 घंटे से यही नही मालूम कि उसका नौनिहाल है कहाँ,उसका ये बेटा,जो अभी एक पैसा कमाता नही.इसी उम्र में दोस्तों के साथ पान खाकर मटरगश्ती कर रहा है,वो कल सिगरेट भी पिएगा,परसों शराब भी पिएगा और बाप का 40 बीघा बेच भी खायेगा.मुझे कत्तई नही करनी है ये शादी.अगुआ समझाता रहा लेकिन,ना तो फिर पक्की ना.बाबूजी अपनी सोच और फैसलों के पक्के थे.उसी समय उन्होंने अगुआ को वापस उनके घर भेजकर अपने इनकार की सूचना भिजवा दी और घर लौट आये.
बहन की शादी को लेकर हमारी धडकनों के बढ़ने-घटने के ये दिन बहुत जल्दी बीत गये.1995 की फरवरी में गाँव से लौट कर बाबूजी ने सूचना दी-बेटी की शादी तय हो गयी.अरे,..हमसब तो जैसे झटका खा गये.-कहाँ,कैसे,कब..?बाबूजी ख़ुशी-ख़ुशी राहत भरी सांस लेकर एक-एक बात बताने लगे.और हम सच में रोने लगे.-11 जून को तिलक है,21 जून को शादी है.लड़का पोस्टग्रेजुएट है.लड़के के चाचा का मुंबई में बिल्डर्स का कारोबार है.लड़के के पिता आयुर्वेद-रत्न हैं.गाँव पर 25 बीघे खेती है.खूब बड़ा-सा मकान है....ह
मने झुंझला के पूछा-बाबूजी लड़का करता क्या है..?खूब बड़े मकान और 25 बीघे खेती से शादी करनी है क्या..?बाबूजी भी झुंझला गये..बोले-जा के देख आओ न तुम भी.लड़का अपने चाचा के काम में हाथ बंटाता है.कहने की ज़रुरत नही है कि हमारे और बाबूजी के बीच बातचीत और बहस की गुंजाइश तो उन्होंने हमेशा बनी रहने दी लेकिन उनके और मेरे बीच अंतिम बात उनकी डपट ही होती थी.उसके बाद हमें चुप रह जाना पड़ता था..खैर लड़का देखने हम भी जायेंगे,सोच कर गाँव आये तो अजब-गजब बातें सुनने को मिलीं. पता चला कि ये लड़का बाबूजी को पसंद क्यों आया.इसलिए पसंद आया कि जिस जमाने में लड़के पान,गुटखा खाते हैं,और सिगरेट,शराब पीते हैं,उस जमाने में ये लड़का उन्हें बाज़ार में सेब खाते हुए मिला था.और वे बस इसी बात पर मुग्ध हो गये थे. हम भी घरद्वार देख आये. एक नजर में तो सब ठीक ही लगा. बात केवल अब मेरी हाँ पर टिकी थी. बाबूजी की परेशानियां और उनका तनाव देखकर हम सब उन्हें राहत तो देना चाहते थे,लेकिन केवल खेती की मात्रा और मकान का आकार देखकर हाँ करने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी. अलबत्ता मेरे तर्कों को बहुत भाव नहीं मिला.संयुक्त परिवारों के अपने ही नियम कानून होते हैं. कैसे इन दबावों,सबकी इच्छाओं,परम्पराओं, मर्यादाओं और एक निश्चित दायरे की सोच मासूम जिंदगियों से खेल जाती है, इस पटकथा के हम प्रमुख पात्र बन गये थे.मेरा मन राजी न होता और बाकी कोई मेरी बातों से बहुत रजामंदी नही रखता- अरे , आज नहीं तो कल कमाएगा ही लड़का और फिर इतनी बड़ी खेती है. "उत्तम खेती, माध्यम बान, निखित चाकरी, भीख निदान" - घाघ की ये कहावत मेरे बाबा का मन्त्र थी. सारी जद्दोजहद और बहस-मुबाहिसे के बाद अंततः यही शादी हो गयी और..

अब मुझे वो बात कहनी है, जो मै नहीं जानता कि कहनी चाहिए या नहीं,लेकिन न कहूँ तो ये सब इतना लिखने का औचित्य ही क्या..? उस घर में जाने के बाद गुडिया सुखी है, ऐसे समाचार दो-चार महीने तक आते रहे.हम सभी बारी-बारी जाते रहे. रवि मुंबई चले गये. घर में रह गया सास-ससुर, जेठानी-भसुर, देवर आदि का कुटुम्ब और नई बहू के रूप में एक अकेली जान- मेरी बहन. मेरा ये लांछन संयुक्त परिवार का संरचना और उसकी गरिमा पर नहीं है लेकिन मेरा यह सवाल उस निकृष्ट मानसिकता पर जरूर है,जो चाहे ग्रामीण हो या शहरी, इससे कोइ फर्क नही पड़ता. नयी आई बहू घर में बिना तनखाह की नौकरानी ही होती है. अपवाद जरूर होंगे लेकिन मेरा निश्चित मानना है कि स्त्री विमर्श के कितने ही पन्ने हमारे घरों में, हमारे घर-दालानों में, हमारी ड्योढ़ी-दरवाजों पे गलीज मर्यादाओं के नाम पर लात - लात रौंदे जाते हैं. हमारे समाजों में ससुराल की जमीन नयी आई बहू को इतना उछालती है, इतना पटकती है कि अगर ज़रा-सी कम मानसिक और शारीरिक कुव्वत की हुई, तो लड़की का खुदा ही मालिक है. इस जीवन-अप-संस्कृति को पुरातन नज़र से देखें तो बहुतेरे परिवारों में महिलाओं को जीवनभर की इस एकतरफा सेवा-टहल और खटनी का इनाम भी मिलता है,तो 10-20 साल बिता लेने के बाद,ससुराल की कसौटियों पर खरी उतर लेने के बाद,बच्चों से लेकर बूढ़ों तक की एक-एक छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी हर उम्मीद को अनवरत पूरा करते जाने का युद्ध लड़ लेने के बाद.यह इनाम उसे मिलता है तब,जब उसकी जगह कोई दूसरी,उसकी देवरानी या बहू उसकी पूरी जिम्मेदारी संभाल लेती है.

तब,जब घर में बिना तनख्वाह काम करने वाली एक दूसरी नौकरानी दाखिल हो जाती है.इनके शरीर को 24 घंटों के हर मोर्चे पर केवल और केवल खटना होता है. सास.ननद और जेठानी के आलावा घर और रिश्तेदारियों की पुरुष बन चुकी औरतों के हाथ पाँव दबाने से लेकर चूल्हा-चौका,झाडू-बर्तन,साफ़-सफाई,कपडा-लत्ता,भोजन-जेवनार,छोटा-बड़ा,इज्जत-मर्यादा...ये सब कुछ इस एक अकेली जान के सिर पर होता है.इन सभी मोर्चों पर शरीर तोड लेने के बाद उसे अपने होने का प्रमाण देना होता है, अपना स्त्रीत्व साबित करना होता है,घर को वारिस भी देना होता है...क्या मजाल कि नयी बहू ससुराल में किसी के चार दिन के बच्चे को भी तू कह कर बोल दे. मर्यादा का धनुष भंग हो जाएगा.जनमतुआ बच्चे-बच्चे को आप कहना,सबकी 'सुनना',सबकुछ करना, मुंह को सिल के और ठोढ़ी के नीचे तक घूँघट में ढँक के रखना अच्छी बहू के अच्छे लच्छन होते हैं.बदले में उसका घर जो उसे देता है,उसका नाम झिडकी है,फटकार है,ताने हैं,उसके बाप-भाई तक की औकात नापते-जोखते कई-कई अफ़साने हैं....

और ऐसा तब है,जब नई बहू नये घर में रहने और चार रोटी खाने की कीमत अपने मायके से लेकर आती है.अलबत्ता ये चार रोटी खाते हुए,उसका दिख जाना धरती का सबसे बड़ा पाप होता है.इसके लिए भी एक कहावत है,जो ज्यादातर सास,ननद ही सुनाती है-मर्द का नहाना और औरत का खाना किसी की नज़र में नही आना चाहिए.अब ये अलग बात है कि इतनी जानदार सांस्कृतिक कहावत के अस्तित्व के बावजूद औरतों से भरे घर के आँगन में खाली चड्ढी पहनकर घर का मर्द तो बड़ी मस्ती से नहाता दिख जाता है.लेकिन 14-16 घंटे का बदनतोड़ श्रम करने के बाद औरत को तो किसी कोने अंतरे,किसी ताखे आदि में बैठ कर छूटी-छटकी,बासी-तिबासी दो रोटी चबा लेनी चाहिए बस.

कुल मिलाकर अपने माँ-बाप की रानी बेटी के लिए उसका वेद-पुराण सम्मत यह नया घर उसकी कब्रगाह बन जाता है.ये शादी नही,एक घिनौना और सडांध मारता एकतरफा समर्पण होता है,जिसकी बदबू के नीचे एक बेटी मर-मर के जीती है.इसलिए कन्यादानियों के इस संकल्प को महापाप और धरती का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार कहने में मुझे कोई हिचक नही होती.मै विवाह के नाम पर इसे व्यापार कहता हूँ,मर्यादाओं के नाम पर इसे बलात्कार कहता हूँ,दरवाजे पर पड़े परदे के पीछे ड्योही की इज्जत के नाम पर इसे हत्या कहता हूँ.अगर लड़की कहीं सचमुच की पढ़ी-लिखी निकल गयी,अगर ज़रा भी सोचने-विचारने का काम कर लिया तो घर परिवार के संस्कारों की राशि भरभरा के गिर पड़ती है.कुलटा,कुलच्छिनी,बदचलन,बेगैरत,आवारा....और इस सीरिज के ढेर सारे तमगे उसे उसी घर से मिलने लगते हैं,जिसकी बगैरत इज्जत का भार उसके सिर पर होता है.इस नई बहू का पति जमाने का सबसे बड़ा उल्लू होता है.मर्यादाओं की जकड़न उसकी जुबान खुलने और पत्नी के पक्ष में खड़े होने का अवसर प्रायः नही के बराबर देती है.हाँ,अगर वह कुछ सचेत हुआ, तो खुद के लिए ढेर सारी बदनामी और विरोध बटोरकर,जोरू का गुलाम कहलाकर भी पत्नी को थोड़ी-सी राहत तो दिला ही लेता है.
खैर...गुडिया अब इस घर की नई बहू थी.और हम सब के हाथ बंधे थे,क्योंकि मर्यादा से खेलने की इजाजत हमें नही थी.हम सिर्फ रो सकते थे.8 साल रवि का मुंबई प्रवास रहा और इस बीच गुडिया नई बहू की चादर ओढ़कर 'तरह-तरह' के लोगों से भरे उस घर में एकाकी जीवन जीती रही.बाबूजी की आँखे बताती थीं कि एक बड़ा और गलत फैसला लेकर अनजाने में ही वे अपनी ही बेटी की ज़िन्दगी से खेल गये थे.अम्मा के दुःख का पार नही मिलता था.गुडिया के एकमात्र संगी हमी बचे थे,जो कहीं भी रहें,हफ्ते में एक बार उसके पास जरूर पहुंच जाते थे.बहुत सारी बातें वह मुझसे कहती.जो नही कह सकती,उसे चिट्ठी में लिखकर मेरे ही हाथों अपनी भाभी तक भिजवा देती.उसके 8 साल के इस एकाकी संघर्ष ने उसे काफी कमज़ोर किया.कैसी-कैसी कमज़ोर बातें करने लगी थी वो,लेकिन सबसे अच्छी बात ये थी कि सबकुछ मुझसे कह देती थी-भईया,हम ज़हर खा लेंगे अब.उन दिनों हमने अपना सारा अर्जित ज्ञान,मेधा,योग्यता,शब्दशक्ति और अपनी पूरी ताकत लगाकर कैसे-कैसे उसे सम्भाले रक्खा,ये केवल हमी जानते हैं.रवि उस बेहद जड़ परिवार का सीधा,सच्चा लेकिन उतना ही जड़ लड़का था.मुझे यह कहने में कोई संकोच नही करना चाहिए कि 25 बीघे खेती वाले उस घर में चाय,चीनी,ब्रश,पेस्ट से लेकर साडी,कपडा,दूध-दही-यानी उसके काम का सबकुछ 8 साल तक लगातार उसके घर पहुंचाते रहे हम.

लेकिन न तो रवि को इन बातों से कोई फर्क पड़ता था न उस परिवार को.इसी बीच घर में चोरी की एक हौलनाक व रहस्यमय घटना भी हुई,जिसमे गुडिया का वह सब कुछ चोरी चला गया,जो वह मायके से लेकर आई थी.उसके बक्से,कपडे,गहने,रूपये,पैसे...यानी सब कुछ.इस एक घटना के बोझ से मेरे सब्र का बाँध अब दरकने लगा था.ऋषभ और कावेरी के आ जाने से गुडिया की ज़िन्दगी में एक ख़ुशी तो आ गयी थी,लेकिन रवि के नकारात्मक रवैये ने मुझे बौखला रक्खा था.चोरी की घटना ने मेरे मन में पूरे परिवार के प्रति संदेह भर दिया था.बाबूजी हमें कुछ भी कहने,करने से हर हालत में रोके हुए थे.बोले-चोरी हो गयी तो हो गयी,हम हैं न.उसके बक्से फिर से भर दिए बाबूजी ने,लेकिन उस परिवार की बेशर्मी ने मुझे बेचैन तो कर ही दिया था.

आखिर एक बेटी के सुख-चैन की ज़िन्दगी के लिए एक बाप को कितना करना पड़ता है,कितना बिकना पड़ता है,और कितना झुकना पड़ता है..और क्यों..?आखिर क्यों..?बेटी न पैदा की,जैसे महापाप कर डाला हो कोई और एक अंतहीन प्रायश्चित किये जा रहे हैं, किये जा रहे हैं,यही सब सोच-सोचकर मेरी नसें तड़तडाने लगती थीं जैसे.इतना सब होने के बावजूद अचानक जब उसकी सासू माँ बीमार पड़ी तो लड़की भईया-बाबा सब भूलकर उनकी सेवा में जुट गयी.बाद में पता चला कि उनको कैंसर है.बड़ी बहू पति के सात चली गयी और छोटी बहू ने सास की सेवा का जिम्मा उठा लिया.पूरे सालभर बिस्तर पर ही रहीं वे.हालत यह हुई कि वजह चाहे कुछ भी हो,उनके लिए बिस्तर से उठना संभव नही था.उन दिनों में उनके दो बेटे और एक बहू परदेस में रहे और एक गुडिया की एकनिष्ठ सेवा ने जितना हो सकता था.उतना आराम उन्हें दिया.

लेकिन उनके चले जाने के बाद घर एकदम से नंगा हो गया.लगा जैसे उस घर का पर्दा ही उड़ गया हो.उनकी मृत्यु के 1 साल के बाद चाचा के लड़के की शादी में हम गुडिया को घर ले आये.घर में बहुत भीड़ थी.शाम के वक्त छत पर गुडिया अकेली बच्चों के साथ बैठी थी.मै उसे खोजते हुए उसके पास पहुंचा तो मुझे देखते ही वह मुह बिचका-बिचका के रो पड़ी.अब उसका रोना तो मुझे मार ही डालता था.मैंने घबरा के उसे पकड़ लिया.क्या हुआ....क्या हुआ..?मैंने पूछना शुरू किया.किसी तरह जब्त करके उसके मुह से दो बोल फूंटे-भईया,मुझे मारा उन लोगों ने......अरे,इतना सुनते तो मेरे आग ही लग गयी.उस वक्त मेरी बुद्धि एकदम से फिर गयी.सब कुछ उल्टा पुल्टा हो गया.दो मिनट तक चुप-चाप उसे सहारा देता रहा,किसी तरह अपना रोना रोके रक्खा,उसके आंसू पोछे फिर नीचे भागा.बहन मुझे रोकती रही-भईया,अभी कुछ मत करिए.....

लेकिन अब सुनता कौन था.....!तीन-तीन,चार-चार सीढियां कूद कर मै नीचे आया और सीधे बाहर दरवाजे पर आकर बाबूजी के सामने चिल्ला पड़ा.बाबूजी के सामने किसी का चिल्लाना घर में एकदम नई बात थी.सामान्य मनोदशा में आँख उठाकर बात करने की हिम्मत नही पड़ती थी किसी की.मेरी आवाज़ का शोर सुन कर जैसे सनाका छा गया सबपर.पूरा घर,औरतें-बच्चे सब घर से बाहर आ गये,बाबूजी तख़्त पर बैठे चुप-चाप मेरी ओर देख रहे थे-क्या हो गया लड़के को,वे सोच रहे थे और मै चिल्ला रहा था-मार डालिए उसको,काट डालिए उसको,अरे ज़हर ही खिला दीजिये किसी तरह,जान छूटे इस लड़की से.अरे,किसलिए मर्द बने फिरते हैं हमलोग,आप की दरोगयी किस दिन काम आएगी,आपकी सिखाई मर्यादाओं के बोझ के नीचे मेरी बहन की जान जा रही है.

और आप साधू बने बैठे है..?फूंक दूंगा सारा घर और मार डालूँगा उन सालों को................हे भगवान,मुझे अब याद नही आता मैंने क्या-क्या कहा उस दिन.इस बीच बाबूजी ने खड़े होकर मुझे सख्ती से थाम लिया था,चिपका लिया था और पूछ रहे थे-क्या हुआ है..?क्या बात है कुछ बताओ तो..?इसी बीच गाय-सी कांपती हुई गुडिया भी सामने आ खड़ी हुई.और अपनी पीठ पर से साडी हटा दी------लाल-लाल साट,जो जहाँ था वो वहीँ खड़ा था,चुप-चाप,सन्नाटा-आवाज केवल गुडिया के सिसक-सिसक कर रोने की और मेरे हांफने की आती थी.गजब के धैर्य वाले थे बाबूजी लेकिन.हम सब से ज्यादा प्रिय उनको वही थी.सब उनको ही देख रहे थे.बाबूजी को जैसे काठ मार गया हो,खड़े-खड़े बेटी की पीठ सहला रहे थे और आंसू पी रहे थे.आवाज़ नही निकल पा रही थी उनकी लेकिन संभाल ही लिया उन्होंने खुद को.उसके आंसू पोछे,मेरा सिर सहलाया,सबको बटोरा,घर में आये.वह रात हम पर बहुत भारी बीती.थोडा शांत होने के बाद उन्होंने गुडिया से सारी बात विस्तार से सुनी-सास के होने तक तो ऐसी हिम्मत नही की किसी ने,

लेकिन उस दिन देवर के आदेश पर तुरंत ध्यान न देने के अभियोग में विवाद इसलिए बढ़ गया कि 'अभी-अभी' 10 साल पहले आई बहू ने देवर को जवाब कैसे दे दिया.अरे नींद आ गयी थी,तो माफ़ी मांग लेती.चचिया सास ने ललकारा था और देवर ने मारा था.गुडिया ने बताया-बाबूजी,मैंने भी भगौना खींच के मारा और चार साल के ऋषभ ने भी लोटा खींच के.
चार दिन बाद ही मेरे घर में शादी थी.लेकिन तब तक हम इंतज़ार नही कर सकते थे.उफ़......कितनी जकडन,कितना बोझ होता है अपनी-अपनी तरह के समाजों का.......!बाबूजी अब भी समझाने की मुद्रा में थे-चार दिन रुक जाओ,शादी के बाद चलेंगे और पूछेंगे.हम सत्य,अहिंसा और ज्ञान-विज्ञान सब भूल गये थे.हमने बाबूजी को जवाब दिया-हम जा रहे हैं फैसला करने,आप आइये,चाहे मत आइये...और हम चल दिए,बाबूजी भी चल दिए.रवि एक दिन पहले ही मुंबई से आया था.वहां पहुंचकर गाडी खड़ी करते ही बाबूजी के रोकते-रोकते भी हम उग्र हो गये.हमने चिल्लाकर कहा-बाहर निकलो हरामजादों.आज हम कन्यादान वसूलने आये हैं.भर्र से घर से सब के सब बाहर निकले,उसके तीनों,चारो ससुरे भी निकले,रवि भी आया.धीरे-धीरे पूरा गाँव ही इकठ्ठा होने लगा.और उस दिन हमपर बाबूजी का नियंत्रण बिलकुल नही था.वे बहुत परेशान थे.सब मिलकर मुझे ही समझाये जाते थे.और लीपापोती करने में लग गये थे.रवि भी हमसे 'शांत रहिये' की गुहार लगा रहा था.

कुछ अंदेशा पहले से सबों को था,इसलिए एक चालाकी की थी सबने.उसके देवर को कहीं छुपा दिया था.बाबूजी ने भद्र-समाज के सामने बेटी का सवाल रक्खा.भीष्म पितामहों के सिर नीचे हो गये.शब्द-व्यापार चलने लगा.गाँव वाले छि-छि कर रहे थे.गुडिया के स्वभाव,सास की सेवा और उसके व्यवहार से प्रभावित महिलाओं और उनके घर वालों ने हमारा पक्ष तो लिया लेकिन दबी जुबान से ही.इतने बड़े पंडित जी से कौन दुश्मनी ले.कुलमिलाकर बात ''छोडिये,जाने दीजिये.'' की ओर घूमने लगी.और यह बात कम से कम मेरे लिए तो बर्दाश से बाहर की थी.रवि का चाचा शकुनी मामा बना बैठा था.उसने मेरे जले पर नमक छिड़क ही तो दिया-आप तो पानी की तरह बोल रहे हैं,ये लड़का आपका बड़ा ताव खा रहा है.दूसरी शादी करेगा क्या बहन की..? वह अभागा नही जानता था कि उस दिन मेरे ऊपर काल सवार था.कुछ नही देखा,बस दौड़ कर उसको गर्दन से पकड़कर घसीट लिया धूल में और आस-पास सब कुछ भूल के सैकड़ों गालियों से उसका अभिषेक कर दिया-कर दूंगा कुत्तों.दूसरी शादी भी कर दूंगा,लेकिन अब यहाँ नही भेजूंगा.कान खोल के सुन ले,जेल में चक्की पिसवाऊंगा सबको.तब तक भीड़ ने उसको मेरे हाथ से छुड़ा लिया था.मेरे क्रोध से 'सभ्य-समाज' मेरे विरुद्ध हो गया.बाबूजी भी शर्मिंदा हुए, लेकिन मुझे कहाँ किसी की पड़ी थी.अफ़सोस ये रहा कि वो लड़का मेरे सामने नही आया,वर्ना आज हम कहीं 302 की सजा काट रहे होते.रवि भी नाराज़ था.हम बाबूजी को लिए-दिए घर आये और बहन को भी अपना निर्णय सुना दिया-नही जाना तुझे उस घर में अब.उस समय तो सबने सुन लिया,लेकिन हाय रे लड़कियों,हाय रे तुम्हारा मन......!इतने सबके बावजूद भी शादी तोड़ने के नाम पर गुडिया राज़ी नही होती थी.

कहती थी वो तो सीधे हैं,उनका क्या दोष.....!लेकिन हम भी भरी महज्जत में चुनौती देकर आये थे,सो उस घर में तो नही भेजना था,शादी भले न टूटे.मुझे समझाने वालों की संख्या सैकड़ों में थी.अम्मा,बाबूजी और गुडिया का चेहरा चुप-चाप ये काम करता ही रहता था.एक बाबूजी ही थे,जो कभी-कभी मुझे घुड़क भी देते थे-तुम कौन हो ये निर्णय करने वाले.....?और रहेगी कहाँ वो,अगर वहां नही जायेगी तो...?उधर से तो मुझे धमकियाँ भी आने लगी थीं.लेकिन इन सब बातों से बेखबर मुझे बस एक ही धुन सवार थी-गुडिया के लिए एक अच्छी-सी नौकरी की तलाश,बस..मै जानता था कि इस हालत में खुले मन की,पढ़ी-लिखी मेरी बहन के लिए एक नौकरी मिल जाए,तो उसके लिए दवा बन जायेगी.अम्मा अकेले में मुझे आशीर्वाद देती थी-तुम्हारे माथे चंदन लगे बेटा,भगवान् तुम्हारी सुन ले.हमने सब ईश्वर पर छोड़ा,हिम्मत जुटाने लगे और रास्ता तलाशने लगे.

एक और कहावत उन दिनों मेरे सिर पर हथौड़े की तरह बजाई जाती थी-अरे बेटा,दस लड़कों को पाल सकते हो,लेकिन एक बेटी का बोझ बहुत भारी होता है....माय फुट...मै दांत पीस कर निकल जाता था.करते-करते गुडिया तीन साल मायके में रह गयी,लेकिन इसी बीच ईश्वर ने मेरी सुन भी ली.मेरे हाथों गुडिया के लिए एक बढ़िया काम का जुगाड़ हो गया.अब एक नई समस्या खड़ी हो गयी.अम्मा बाबूजी मुझे इस बात के लिए समझा रहे थे कि नौकरी की व्यवस्था रवि के लिए करना ज़रूरी है.बाद में ये बात कुछ मुझे भी समझ में आने लगी.कुछ मित्रों और मेरे कुछ अजीजों ने मिलकर वह व्यवस्था भी कर दी.मैंने सन्देश भेज कर रवि को बनारस बुलवाया.

नाक मुंह फुलाए-फुलाए ही रवि ने नौकरी ज्वाइन कर ली.तीन-चार महीने बाद गुडिया को भी घर से बुला लिया और उसकी वही नौकरी उसे मिल गयी,जिसे उस समय बाबूजी ने करने नही दिया था उसे.दो स्वयंसेवी संस्थाओं में अलग-अलग नौकरी करते हुए दोनों यहीं मेरे घर में बच्चों के साथ कुछ महीने रहे.फिर यहीं 'कोनिया' में अपनी व्यवस्था जमा ली.दो साल बाद ही रवि को अनुभव के आधार पर कनाडा की एक संस्था ने बिहार में जॉब दे दी और वह मोतिहारी चला गया.गुडिया यहाँ अपने बच्चों के साथ फिर अकेली छूट गयी.कहने लायक एक ख़ास बात ये कि मेरे अनुभव बताते हैं कि औरतों में संघर्ष करने का माद्दा पुरुषों से अधिक होता है.पिछले 6 सालों में गुडिया ने फिर एकाकी जीवन ही जिया.बच्चों की परवरिश और अपनी नौकरी के साथ ताल-मेल बनाते-बिठाते,यहाँ-वहां दिन-दिनभर भागते अथक श्रम करते मैंने अपनी ही छोटी बहन को लगातार देखा..लगातार देखा.रवि महीने में एक बार बनारस आते रहे और गुडिया का संघर्ष चलता रहा.इसी दौरान,इन्ही संघर्षों के बीच बाबूजी को अंतिम बीमारी ने घेरा.हम सब बाबूजी को क्षीण होते और विदा लेने की तैयारी करते निरीह भाव से देखते रहे.अपने अंतिम दिनों में जीभ के कैंसर से घायल बाबूजी बोल नही पाते थे.एक दिन जब हम घर में नही थे तो वे गुडिया के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये.लटपटाती जुबान से कहा था-हमने तेरे साथ गलती कर दी.वह रो पड़ी-बाबूजी, ऐसा मत कहिये,आपकी ये बातें सुनकर और आपका यह चेहरा याद कर के हम कैसे जियेंगे.तब बाबूजी ने कागज़ पर लिखकर उसे चुटका पकड़ाया.लिखा था-भईया है न.
ओह......गला रुद्ध हुआ पड़ा है.कलम चलती नही है लेकिन अपनी ही बहन के साथ आज मेरी कलम को न्याय करना है तो रुकूँ कैसे.उम्मीदों और विश्वासों का कितना सारा बोझ मेरे सिर पर छोड़कर बाबूजी तो चले गये.गुडिया और रवि की गृहस्थी संवारने में दोनों ने बहुत मेहनत की.बच्चे बड़े हो गये,रवि ने भी खूब तरक्की की.अभी एक महीना पहले उनकी ऑफिस ने एक और प्रमोशन देकर उनको बक्सर भेजा तो शाम को गुडिया मिठाई लेकर घर आयी,हमने पूछा-ई का रे..?बोली-भईया अब नौकरी नही करेंगे हम,उसी की ख़ुशी में मिठाई खिलने आये हैं.पूरी बात सुनी तो दिल भर आया.बोली हम बक्सर जा रहे हैं.हंस रही थी,रो रही थी,खुश थी,उदास थी....लेकिन आपसब मेरी ख़ुशी का अंदाज़ा लगाइए जब उसने मुझसे कहा-हम साल,दो साल में लौटकर फिर बनारस ही आयेंगे.मेरे लिए एक बिस्सा ज़मीन खोज कर रखियेगा भइया.

मैंने पूछा-इतना जमा कर लिया क्या रे..?तो बोली-सब आप ही का किया-धरा है,हम क्या जमा करेंगे.इन्ही बीते सालों में वह समय भी आया और गया जब सबके साथ-साथ गुडिया भी मुझे समझाने लगी कि भईया घर से क्या दुश्मनी है.घर छोड़ देना कौन-सी समझदारी है.तन के कितने दिन रहा जा सकता है.बीती बातें भूलनी भी चाहिए.गुस्सा कब तक पालेंगे..?अब मै उसे क्या बताता,कि इसी गुस्से के बल पर तो मै उसे ये छोटी सी दुनिया दे पाया हूँ.खुद पर ही हंसी आ जाती और वह इधर मुझे समझाती जाती,उधर अपने टूटे छूटे रिश्ते आ-जा कर संजोती जाती,संभालती जाती.जिस बात के लिए मैंने बाबूजी की भी एक न सुनी,उस बात के लिए मैंने उसके सामने,उसी की ख़ुशी के लिए हथियार डाल दिए.

उसे हर बार मुझसे इजाज़त लेनी पड़ती थी.मैंने एक लाइन में अपनी बात कह दी-देख गुडिया,तेरे ही खुशी और सम्मान के लिए वह घर छुड़ाया था तुझसे.बाबूजी दुनिया से चले गये लेकिन वहां फिर कभी नही गये.अगर तेरी ख़ुशी के लिये मुझे वहां भी जाना पड़े तो कभी जाऊँगा ही.तेरी तो किस्मत ही उस घर से बंधी है,मै कबतक रोकूंगा..जाओ.आपको बताऊँ कि उसने अपना सबकुछ संभाल लिया.मैंने सुना,रवि ने अपने भाई को बुलाकर उससे माफ़ी भी मंगवाई.सब ठीक हो गये.सब एक हो गये.लेकिन ये भी सुनता हूँ कि अब जब गुडिया उस घर में जाती है,तो लोग उससे डरते भी हैं,उसका सम्मान भी करते हैं.उसके ससुर अंतिम दिनों में अपनी पत्नी की सेवा के लिए उसके एहसानमंद भी होते हैं.और अपनी सबसे लायक बहू बताते नही थकते हैं,अलबत्ता मेरे साथ उनका कोई रिश्ता अब भी नही है.अपनी नौकरी के दौरान गुडिया ने देश खूब घूमा,दिल्ली से मदुरई तक तमाम शहरों में महिलाओं के मुद्दों पर कई मंचों से उसने खूब भाषण दिए.उसकी ख़बरों और चित्रों वाले अखबारों की कटिंग्स से बनी उसकी फ़ाइल देख कर उसके गाँव में बड़ी-बूढ़ियाँ कहती हैं-दरोगा की बेटी है,पढ़ी-लिखी है,चूल्ह पोतने के लिए थोड़ी न भेजा था उसके बाप ने वगैरह....वगैरह...वगैरह....वगैरह.....!!

ये थी वो कहानी,जिसका मैंने वादा किया था आपसे.अपने इन्ही अनुभवों से गुजरने के बाद मैंने कभी लिखा था कि घर की पुरानी औरतों और नयी बहू के बीच जो दो पक्ष बन जाते हैं,उसमे दोनों के औरत होने के बावजूद ये जो शोषण का रिश्ता बन जाता है,उसे देखकर बहुतायत में लोगों को यह कहते सुना जाता है कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है.वास्तव में ऐसा होता नही.जब हम कहते हैं कि औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन है,तो जाने अनजाने एक बड़ा अपराध कर गुजरते हैं,औरत की लड़ाई को कमजोर कर देते हैं.थोड़ी बारीकी से देखें तो इस मर्दवादी किस्म की बात का अर्थ समझ में आएगा.गुलामों की परम्परा को जरा करीब से देखिये.जमींदारों के घर जो हरकारे,नौकर होते थे..

वो उन्ही गांवों,समाजों से होते थे,जिनपर जमीदारों का जुल्म कहर बन के गिरता था..अपने ही समाज और अपने ही लोगों पर ये लोग जमींदारों को खुश करने,उनकी कृपा हासिल करने के लिए उनसे आगे बढ़ के कहर ढाते थे..लेकिन यहाँ आप ये नही कह सकते कि गाँव वाले ही गाँव वालों के दुश्मन होते थे..असल अपराधी तो वो था,जिसके कृपापात्र बने रहने और अधिक से अधिक लाभ पाने के लिए उसके करीब रहने वाले लोग अपने ही लोगों को सताते थे...एक और उदाहरण से समझें....जलियांवाला बाग में आन्दोलनकारियों पर गोली चलाने वाले सिपाही हिन्दुस्तानी ही थे.अंग्रेज जनरल ने तो केवल आदेश दिया था...तो क्या हम कह सकते हैं कि हिन्दुस्तानी ही हिन्दुस्तानी के दुश्मन थे....??ठीक उसी तरह यह नही कहा जा सकता कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है...ये केवल बड़े गुलाम और छोटे गुलाम वाला मामला है..ये बड़े गुलाम मर्द साहबान के करीब होते हैं और उनकी नज़रे इनायत पाने के लिए छोटे गुलामों पर कड़ी नजर रखते हैं,बस इतनी सी तो बात है..औरत औरत की दुश्मन है,ये कहने से लड़ाई में कमजोरी आती है...

एक बात मुझे ये भी लगती है कि किसी लड़की के वैवाहिक जीवन में इस तरह का जो अंतहीन दर्द आता है,उसकी जिम्मेदारी निर्विवाद रूप से उसके पिता और भाई पर आयद होती है... इस समस्या की जड़ें हमारे ही स्वार्थ के अंधे कुँए में कहीं हैं.इस बात से मै पूरी तरह सहमत हूँ कि शादी के नाम पर एक घरेलू नौकरानी का इंतजाम करने वाले समाज के रहवासी हैं हम.तीन किस्म की गुलामी में घेरते हैं हम अपनी बेटियों को.उसका विवेक निर्णयात्मक हो,इसके लिए उसे पर्याप्त शिक्षा नही देते..उसका आत्विश्वास मज़बूत हो,इसके लिए उसको अपने फैसले खुद करने की आज़ादी नही देते..और वह खुद आत्मनिर्भर हो सके,इसके लिए अपनी जायदाद में हिस्सा नही देते...और बस समस्या की जड़ यहीं है.हम ये कह के मुक्त हो लेते हैं कि बेटी तो ससुराल से भी पाती ही है.क्या पाती है बेटी ससुराल से...?जो दहेज़ लेकर किसी की बेटी ले जाते हैं,वे क्या जायदाद देंगे उसे...?पिता और भाई होने के नाते हम खुद अपनी बेटियों को जो देने का स्वांग करते हैं.....

दान,दहेज़,नेग,वगैरह,मै तो कहता हूँ कुछ मत दो.केवल अच्छे से पढ़ा दो भाई..और जैसे बेटों में बांटते हो,जमीन और घर का एक हिस्सा और लगा दो...खाली जुबानी जमाखर्च नही,कागज़ पर...जिस दिन बेटी के पास ससुराल से पलटकर वापस आने का एक अपना रजिस्टर्ड ठिकाना होगा,अपना एक घर होगा,उस दिन डोली-अर्थी के चक्रव्यूह से वह मुक्त हो जायेगी, जिस दिन बुरे वक़्त में सहारा बनने के लिए उसके पास अपने रिश्ते और अपनी आर्थिक व्यवस्था होगी, उसी दिन से वह आत्मसम्मानी, आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर हो जायेगी..पत्नी और बहू के साथ व्यवहार करना अगर हमे नही आता,तो यही कर डालो...बेटियों की आँख के आंसू तो सूखें....हर पिता से मेरा आग्रह है कि आप दीजिये अपनी बेटी को वो सारे हक.उसके सारे अधिकार.

बेटी न हो तो भतीजी को दिलवाइए.किसी एक भी बेटी को अगर आप उसके बाप की हैसियत में से उसका हिस्सा दिलवा सके...तो समझ लीजिये हजारों,लाखों बेटियों,बहनों,लड़कियों के हक़ की लड़ाई को दिशा मिल जाएगी...मै अपनी बेटी के नाम अपने घर और ज़मीन में उसके दोनों भाइयों के साथ १/३ हिस्सा दूंगा.ये मैंने सबको बता रखा है.. औरतों को लड़ना होगा,लड़ना होगा,ये कह के तो हम आखिरी उम्मीद भी ख़त्म कर देते हैं..अरे उसका सत्यानाश तो हमने कर रखा है.....तो वो क्यों लड़े..लड़ना तो पुरुषों को ही चाहिए औरत के हक की लड़ाई...मैंने लड़ी है दोस्त अपनी बहन के हक की लड़ाई..अभी बहुत कुछ बाकी भी है,जानता हूँ मै...