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Sunday, April 27, 2014

नई क़लम का पुनः प्रकाशन ( हार्ड कॉपी )

नई क़लम - उभरते परिवार की ख़ुशी आप सब के साथ बाँट रहा हूँ... 14 साल पहले मैंने और मेरे अजीज़ दोस्त दीपक मशाल ने इस पत्रिका को निकाला था..हुआ यूँ , इंजीनियरिंग के चक्कर में मुझे मेरठ जाना पड़ गया और दीपक को. दिल्ली वैज्ञानिक होने के लिए..... उस वक़्त एक अंक निकल पाया फिर गाड़ी.. रुक गयी...

लेकिन साहित्य के लगाओ को कभी भी कम न कर पाया या यूँ कहें न हुआ. होना भी नहीं चाहिए था.. सुकून जो मिलता था, मिलता है.... तो उस सुकून को हम दोनों ने नई कलम- उभरते हस्ताक्षर ब्लॉग बनाकर ये सिलसिला चलता रहा ...आप सब लेखक मित्रों की रचनाएं समय- समय पे मिलती रहीं... और हम उसे नई कलम के मंच पे शाया करते रहे.

आज फिर साहित्य के पहियों की पटरियों पे नई कलम -उभरते हस्ताक्षर दौड़ने को तैयार है.. आपके प्यार की दरकार हमेशा की तरह रहेगी...

नए कलेवर और नयी साज -सज्जा के के साथ फिर से नई क़लम -उभरते हस्ताक्षर आपके हाथों में होगी.. 4 मई 2014 को हम फिर से अपने मेहमानों के बीच उस पौधे में पानी दे रहे हैं...

इसी सिलसिले में में आपसे लेख, व्यंग्य, नज़्म, ग़ज़ल, कवितायें, कहानी , उपन्यास ...कोई साहित्यिक शोध पत्र आपसे भेजने को कह रहा हूँ.. आप सब से उम्मीद है आप हमारा सहयोग करेंगे....वैसे ही जैसे आप इसके ई - संस्करण में करते रहे...

आप हमें अपनी रचनाएँ आज रात तक इस मेल पते पर भेजने का कष्ट करें -

nai.qalam@gmail.com

आपका
शाहिद 'अजनबी' और दीपक 'मशाल'

Friday, April 25, 2014

अपनी आपबीती गुड़िया बक्सर गयी :- जीवंत संस्मरण

वरिष्ठ पत्रकार प्रेम प्रकाश जी का  जीवंत संस्मरण  आपके हाथों में सौंप रहा हूँ.... नई क़लम- उभरते हस्ताक्षर के मंच पे एक बड़े कलमकार का  बड़ा जीवंत संस्मरण  ---

अपनी आपबीती
गुड़िया बक्सर गयी..
............................
आज सुबह-सुबह ही रोने का सामान हो गया.पूरे 8 साल बनारस में रहकर मुझसे 6 साल छोटी मेरी बहन गुड़िया अपने पति और बच्चों के साथ बक्सर शिफ्ट हो गयी.अब,जब कि उसके सकुशल नये शहर और नये घर में पहुँच जाने की सूचना मिल गयी है,तो उसे याद करने बैठा हूँ.पिछले महीने ही जब रवि का ट्रान्सफर मोतिहारी से बक्सर हुआ तभी से उसके बक्सर जाने के चर्चे थे.ऋषभ और कावेरी,उसके दोनों बच्चे बहुत खुश थे.खुश तो गुडिया भी थी,क्योंकि इन 8 सालों में रवि मोतिहारी और वो बच्चों के साथ यहाँ बनारस में अकेले-अकेले ही थे.पिछले एक हफ्ते से उसका यह जाना अम्मा,और हम सब के मन पर बुरी तरह छाया हुआ था.

खुश तो हम सब थे,लेकिन गले में कुछ फंसा हुआ भी हम सभी के अन्दर था.गाँव से अम्मा का फोन आना बढ़ गया था.अम्मा उससे कहतीं कि भईया बनारस में अकेले रह जायेंगे.मुझसे कहतीं कि कैसे रहेगी वो वहां तुम लोगों के बिना.तीन दिन पहले से सामान पैक हो रहा था.यहाँ से आधा किलोमीटर दूर यहीं 'कोनिया' में किराए के घर में रह रही थी गुड़िया.आज सुबह गाडी भी आ गयी 6 बजे ही उसका फोन आया--''भईया,जा रहे हैं हम''.घर से सबको ले-दे के उसके घर पहुंचे तो सामान बाहर आ चुका था.मोहल्ले की 30-40 महिलायें उसे घेरे हुए थीं,और उसकी आँखें लाल.......डभ-डभ....रोये जा रही थी.मुझे देखा तो लिपट गयी......... मुझे लगता है कि उसे 19 साल पहले बाबूजी ने विदा नही किया था.विदा तो उसे आज हमने ही किया है.उन्नीस साल पहले का मंज़र याद करता हूँ,तो ये जो आज गले में 'कुछ'फंसा हुआ है,लगता है ये तभी से ही फंसा हुआ है.दो बड़े भाइयों के बीच अकेली बहन के नाते स्वाभाविक ही बहुत दुलार में पली वो.संयुक्त परिवार होने के नाते हम सभी 8 भाइयों के बीच दो ही बहनें थीं.1994 में गोरखपुर युनिवर्सिटी से ग्रजुएशन कम्पलीट करते-करते बाबूजी उसकी शादी के चक्कर में पड गये थे.

परम्पराएं,रीति-रिवाज और इनके प्रति ग्रामीण मन का मोह कितना सघन होता है,यह एक बार फिर बहुत करीब से देख रहे थे हम.मेरी शादी हो चुकी थी.बीच में एक और बड़े भाई के होने के बावजूद बेटी का ब्याह पहले करेंगे इसके लिए बाबूजी पर बहुत दबाव था.जब भी उसकी शादी का ज़िक्र चलता,हम दोनों भाई बेचैन हो जाते.एक वही तो थी दोनों भाइयों के लिए आकर्षण,मनोरंजन,दुश्मन...सब एक साथ.दुश्मन इसलिए कि बाबूजी तक हम दोनों भाइयों की शिकायतें वही पहुंचाती थी,बाबूजी की सीआइडी इंस्पेक्टर.बचपन में रोज सुबह उठ के हम दोनों भाई उसको पैर छू के प्रणाम करते थे.लक्ष्मी थी न बाबूजी की.सामान्य दुनियादारी से कुछ अलग हट के अपने बच्चों को ज़िन्दगी के मूल्यों की शिक्षा देने वाले बाबूजी की उसकी शादी के लिए जल्दबाजी देखकर हम हैरान थे.ऊपर से उनकी ये बात तो हमारी जान ही निकाल लेती थी कि शादी गाँव से ही करेंगे और गाँव में ही करेंगे.हमारे गाँवों में कई सारी कहावतें होती हैं.जो सामान्य जनजीवन को दिशा भी देती है और उसकी दशा भी बताती हैं,समाज को उत्प्रेरित भी करती हैं,प्रभावित भी करती हैं,सीमित भी करती हैं,दायरे भी खींच देती हैं.ऐसी दो कहावतों का ज़िक्र करूँ----एक बेटी,नौ दामाद....माने एक बेटी के लिए रिश्ता खोजने आपको कितने ही घरों में जाना पड़ता है,टकराना पड़ता है,सालों साल तलाश करनी होती है एक ऐसे इंसान की,जिसके हाथ में अपनी बेटी सौंपकर पिता निश्चिन्त हो सके,मुक्त हो सके.दूसरी कहावत है---बेटी के लिए शादी खोजने में बाप के पाँव के जूते घिस जाते हैं....बाबूजी पर इन दोनो कहावतों का ज़बरदस्त असर था.छुट्टी लेकर गाँव जाते,10-20 गाँव घूमते और शादी तय नही होती.लौट कर बताते तो हम भाई-बहन सब खुश हो जाते.एक बार तो उन्होंने झुंझलाकर अपना जूता निकाला और एक पत्थर पर जोर-जोर से घिसने लगे.यकीन मानिए,उस खुरदुरे पत्थर पर रगड़ खाकर उनका जूता घिस ही तो गया.हम लोग हंस रहे थे,उनसे जूता छीन रहे थे.वे बोले-ना,आज तो इसको घिस के ही मानूंगा,लड़का मिलेगा कैसे नही.लड़का देखने की उनकी कसौटियां भी गज़ब की थीं.एक जगह पहुंचे तो पता चला कि पंडित जी की 40 बीघे की खेती है.4 बीघा चना तो घर के सामने वाले खेत में ही लगा रखा था.बड़ा-सा हवेली जैसा मकान था,दरवाजे पर ट्रेक्टर खड़ा था.बेटियाँ ब्याह दी हैं,बड़ा बेटा शादीशुदा है और नौकरी में है.दूसरा बेटा बाकी है. बेटी के लिए शादी देखते समय हमारे तरफ घर और वर देखते हैं.माने पहले हैसियत उसके बाद लड़का.जबकि मुझे लगता है इसको उलट के देखना चाहिए.पहले वर फिर घर.बाबूजी एकांगी धारा के आदमी नही थे.बेटी बड़ी हो गयी,ये सामाजिक दबाव उनपर भले था,लेकिन दृष्टि उनकी खूब गहरी थी.घर और हैसियत देखकर शादी उनको भा गयी.उन्होंने पूछा-लड़का कहाँ है..?ज़रा बुलाइए.लड़के के पिता ने उत्तर दिया-होगा यहीं कहीं,आता होगा,आ जाएगा.

बात-चीत होने लगी.दान-दहेज,मोल-भाव आदि सारी दुनियादारी तय हो गयी और लगभग 2-3 घंटे बीत गये.बाबूजी ने एकबार फिर पूछा-लड़का आया नही अब तक..?लड़के के पिता परेशान थे,बोले-पता नही,कुछ कह के नही गया,संगी-साथियों के साथ होगा कहीं.आ जाएगा अभी.उनके जवाब से बाबूजी को तसल्ली नही हुई,वे लड़के को देखकर ही लौटना चाहते थे.क्या पता,फिर छुट्टी कब मिले,न मिले.लेकिन करते भी क्या...फिर मिलने का तय करके बाबूजी उठ आये.गाँव से बाहर निकलते समय अगुआ ने दिखाया-देखिये,यही है लड़का.4-6 लड़कों के साथ मुंह में पान घुलाये लड़का मोटरसाइकिल से आता दिखा.बाबूजी अगुआ से बोले..-शादी नही करेंगे.अगुआ का मन धक्क से रह गया.-काहे भईया...?,ऐसा क्या हो गया,..?ऐसी हैसियत वाली शादी मिलती कहाँ है..?अरे,बेटी के भाग जाग जायेंगे.लेकिन उनको जवाब बाबूजी ने नही,बाबूजी की कसौटी ने दिया-भाग जाग नही जायेंगे दुबे जी,बेटी के भाग फूट जायेंगे इस घर में.जिस बाप को 4 घंटे से यही नही मालूम कि उसका नौनिहाल है कहाँ,उसका ये बेटा,जो अभी एक पैसा कमाता नही.इसी उम्र में दोस्तों के साथ पान खाकर मटरगश्ती कर रहा है,वो कल सिगरेट भी पिएगा,परसों शराब भी पिएगा और बाप का 40 बीघा बेच भी खायेगा.मुझे कत्तई नही करनी है ये शादी.अगुआ समझाता रहा लेकिन,ना तो फिर पक्की ना.बाबूजी अपनी सोच और फैसलों के पक्के थे.उसी समय उन्होंने अगुआ को वापस उनके घर भेजकर अपने इनकार की सूचना भिजवा दी और घर लौट आये.
बहन की शादी को लेकर हमारी धडकनों के बढ़ने-घटने के ये दिन बहुत जल्दी बीत गये.1995 की फरवरी में गाँव से लौट कर बाबूजी ने सूचना दी-बेटी की शादी तय हो गयी.अरे,..हमसब तो जैसे झटका खा गये.-कहाँ,कैसे,कब..?बाबूजी ख़ुशी-ख़ुशी राहत भरी सांस लेकर एक-एक बात बताने लगे.और हम सच में रोने लगे.-11 जून को तिलक है,21 जून को शादी है.लड़का पोस्टग्रेजुएट है.लड़के के चाचा का मुंबई में बिल्डर्स का कारोबार है.लड़के के पिता आयुर्वेद-रत्न हैं.गाँव पर 25 बीघे खेती है.खूब बड़ा-सा मकान है....ह
मने झुंझला के पूछा-बाबूजी लड़का करता क्या है..?खूब बड़े मकान और 25 बीघे खेती से शादी करनी है क्या..?बाबूजी भी झुंझला गये..बोले-जा के देख आओ न तुम भी.लड़का अपने चाचा के काम में हाथ बंटाता है.कहने की ज़रुरत नही है कि हमारे और बाबूजी के बीच बातचीत और बहस की गुंजाइश तो उन्होंने हमेशा बनी रहने दी लेकिन उनके और मेरे बीच अंतिम बात उनकी डपट ही होती थी.उसके बाद हमें चुप रह जाना पड़ता था..खैर लड़का देखने हम भी जायेंगे,सोच कर गाँव आये तो अजब-गजब बातें सुनने को मिलीं. पता चला कि ये लड़का बाबूजी को पसंद क्यों आया.इसलिए पसंद आया कि जिस जमाने में लड़के पान,गुटखा खाते हैं,और सिगरेट,शराब पीते हैं,उस जमाने में ये लड़का उन्हें बाज़ार में सेब खाते हुए मिला था.और वे बस इसी बात पर मुग्ध हो गये थे. हम भी घरद्वार देख आये. एक नजर में तो सब ठीक ही लगा. बात केवल अब मेरी हाँ पर टिकी थी. बाबूजी की परेशानियां और उनका तनाव देखकर हम सब उन्हें राहत तो देना चाहते थे,लेकिन केवल खेती की मात्रा और मकान का आकार देखकर हाँ करने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी. अलबत्ता मेरे तर्कों को बहुत भाव नहीं मिला.संयुक्त परिवारों के अपने ही नियम कानून होते हैं. कैसे इन दबावों,सबकी इच्छाओं,परम्पराओं, मर्यादाओं और एक निश्चित दायरे की सोच मासूम जिंदगियों से खेल जाती है, इस पटकथा के हम प्रमुख पात्र बन गये थे.मेरा मन राजी न होता और बाकी कोई मेरी बातों से बहुत रजामंदी नही रखता- अरे , आज नहीं तो कल कमाएगा ही लड़का और फिर इतनी बड़ी खेती है. "उत्तम खेती, माध्यम बान, निखित चाकरी, भीख निदान" - घाघ की ये कहावत मेरे बाबा का मन्त्र थी. सारी जद्दोजहद और बहस-मुबाहिसे के बाद अंततः यही शादी हो गयी और..

अब मुझे वो बात कहनी है, जो मै नहीं जानता कि कहनी चाहिए या नहीं,लेकिन न कहूँ तो ये सब इतना लिखने का औचित्य ही क्या..? उस घर में जाने के बाद गुडिया सुखी है, ऐसे समाचार दो-चार महीने तक आते रहे.हम सभी बारी-बारी जाते रहे. रवि मुंबई चले गये. घर में रह गया सास-ससुर, जेठानी-भसुर, देवर आदि का कुटुम्ब और नई बहू के रूप में एक अकेली जान- मेरी बहन. मेरा ये लांछन संयुक्त परिवार का संरचना और उसकी गरिमा पर नहीं है लेकिन मेरा यह सवाल उस निकृष्ट मानसिकता पर जरूर है,जो चाहे ग्रामीण हो या शहरी, इससे कोइ फर्क नही पड़ता. नयी आई बहू घर में बिना तनखाह की नौकरानी ही होती है. अपवाद जरूर होंगे लेकिन मेरा निश्चित मानना है कि स्त्री विमर्श के कितने ही पन्ने हमारे घरों में, हमारे घर-दालानों में, हमारी ड्योढ़ी-दरवाजों पे गलीज मर्यादाओं के नाम पर लात - लात रौंदे जाते हैं. हमारे समाजों में ससुराल की जमीन नयी आई बहू को इतना उछालती है, इतना पटकती है कि अगर ज़रा-सी कम मानसिक और शारीरिक कुव्वत की हुई, तो लड़की का खुदा ही मालिक है. इस जीवन-अप-संस्कृति को पुरातन नज़र से देखें तो बहुतेरे परिवारों में महिलाओं को जीवनभर की इस एकतरफा सेवा-टहल और खटनी का इनाम भी मिलता है,तो 10-20 साल बिता लेने के बाद,ससुराल की कसौटियों पर खरी उतर लेने के बाद,बच्चों से लेकर बूढ़ों तक की एक-एक छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी हर उम्मीद को अनवरत पूरा करते जाने का युद्ध लड़ लेने के बाद.यह इनाम उसे मिलता है तब,जब उसकी जगह कोई दूसरी,उसकी देवरानी या बहू उसकी पूरी जिम्मेदारी संभाल लेती है.

तब,जब घर में बिना तनख्वाह काम करने वाली एक दूसरी नौकरानी दाखिल हो जाती है.इनके शरीर को 24 घंटों के हर मोर्चे पर केवल और केवल खटना होता है. सास.ननद और जेठानी के आलावा घर और रिश्तेदारियों की पुरुष बन चुकी औरतों के हाथ पाँव दबाने से लेकर चूल्हा-चौका,झाडू-बर्तन,साफ़-सफाई,कपडा-लत्ता,भोजन-जेवनार,छोटा-बड़ा,इज्जत-मर्यादा...ये सब कुछ इस एक अकेली जान के सिर पर होता है.इन सभी मोर्चों पर शरीर तोड लेने के बाद उसे अपने होने का प्रमाण देना होता है, अपना स्त्रीत्व साबित करना होता है,घर को वारिस भी देना होता है...क्या मजाल कि नयी बहू ससुराल में किसी के चार दिन के बच्चे को भी तू कह कर बोल दे. मर्यादा का धनुष भंग हो जाएगा.जनमतुआ बच्चे-बच्चे को आप कहना,सबकी 'सुनना',सबकुछ करना, मुंह को सिल के और ठोढ़ी के नीचे तक घूँघट में ढँक के रखना अच्छी बहू के अच्छे लच्छन होते हैं.बदले में उसका घर जो उसे देता है,उसका नाम झिडकी है,फटकार है,ताने हैं,उसके बाप-भाई तक की औकात नापते-जोखते कई-कई अफ़साने हैं....

और ऐसा तब है,जब नई बहू नये घर में रहने और चार रोटी खाने की कीमत अपने मायके से लेकर आती है.अलबत्ता ये चार रोटी खाते हुए,उसका दिख जाना धरती का सबसे बड़ा पाप होता है.इसके लिए भी एक कहावत है,जो ज्यादातर सास,ननद ही सुनाती है-मर्द का नहाना और औरत का खाना किसी की नज़र में नही आना चाहिए.अब ये अलग बात है कि इतनी जानदार सांस्कृतिक कहावत के अस्तित्व के बावजूद औरतों से भरे घर के आँगन में खाली चड्ढी पहनकर घर का मर्द तो बड़ी मस्ती से नहाता दिख जाता है.लेकिन 14-16 घंटे का बदनतोड़ श्रम करने के बाद औरत को तो किसी कोने अंतरे,किसी ताखे आदि में बैठ कर छूटी-छटकी,बासी-तिबासी दो रोटी चबा लेनी चाहिए बस.

कुल मिलाकर अपने माँ-बाप की रानी बेटी के लिए उसका वेद-पुराण सम्मत यह नया घर उसकी कब्रगाह बन जाता है.ये शादी नही,एक घिनौना और सडांध मारता एकतरफा समर्पण होता है,जिसकी बदबू के नीचे एक बेटी मर-मर के जीती है.इसलिए कन्यादानियों के इस संकल्प को महापाप और धरती का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार कहने में मुझे कोई हिचक नही होती.मै विवाह के नाम पर इसे व्यापार कहता हूँ,मर्यादाओं के नाम पर इसे बलात्कार कहता हूँ,दरवाजे पर पड़े परदे के पीछे ड्योही की इज्जत के नाम पर इसे हत्या कहता हूँ.अगर लड़की कहीं सचमुच की पढ़ी-लिखी निकल गयी,अगर ज़रा भी सोचने-विचारने का काम कर लिया तो घर परिवार के संस्कारों की राशि भरभरा के गिर पड़ती है.कुलटा,कुलच्छिनी,बदचलन,बेगैरत,आवारा....और इस सीरिज के ढेर सारे तमगे उसे उसी घर से मिलने लगते हैं,जिसकी बगैरत इज्जत का भार उसके सिर पर होता है.इस नई बहू का पति जमाने का सबसे बड़ा उल्लू होता है.मर्यादाओं की जकड़न उसकी जुबान खुलने और पत्नी के पक्ष में खड़े होने का अवसर प्रायः नही के बराबर देती है.हाँ,अगर वह कुछ सचेत हुआ, तो खुद के लिए ढेर सारी बदनामी और विरोध बटोरकर,जोरू का गुलाम कहलाकर भी पत्नी को थोड़ी-सी राहत तो दिला ही लेता है.
खैर...गुडिया अब इस घर की नई बहू थी.और हम सब के हाथ बंधे थे,क्योंकि मर्यादा से खेलने की इजाजत हमें नही थी.हम सिर्फ रो सकते थे.8 साल रवि का मुंबई प्रवास रहा और इस बीच गुडिया नई बहू की चादर ओढ़कर 'तरह-तरह' के लोगों से भरे उस घर में एकाकी जीवन जीती रही.बाबूजी की आँखे बताती थीं कि एक बड़ा और गलत फैसला लेकर अनजाने में ही वे अपनी ही बेटी की ज़िन्दगी से खेल गये थे.अम्मा के दुःख का पार नही मिलता था.गुडिया के एकमात्र संगी हमी बचे थे,जो कहीं भी रहें,हफ्ते में एक बार उसके पास जरूर पहुंच जाते थे.बहुत सारी बातें वह मुझसे कहती.जो नही कह सकती,उसे चिट्ठी में लिखकर मेरे ही हाथों अपनी भाभी तक भिजवा देती.उसके 8 साल के इस एकाकी संघर्ष ने उसे काफी कमज़ोर किया.कैसी-कैसी कमज़ोर बातें करने लगी थी वो,लेकिन सबसे अच्छी बात ये थी कि सबकुछ मुझसे कह देती थी-भईया,हम ज़हर खा लेंगे अब.उन दिनों हमने अपना सारा अर्जित ज्ञान,मेधा,योग्यता,शब्दशक्ति और अपनी पूरी ताकत लगाकर कैसे-कैसे उसे सम्भाले रक्खा,ये केवल हमी जानते हैं.रवि उस बेहद जड़ परिवार का सीधा,सच्चा लेकिन उतना ही जड़ लड़का था.मुझे यह कहने में कोई संकोच नही करना चाहिए कि 25 बीघे खेती वाले उस घर में चाय,चीनी,ब्रश,पेस्ट से लेकर साडी,कपडा,दूध-दही-यानी उसके काम का सबकुछ 8 साल तक लगातार उसके घर पहुंचाते रहे हम.

लेकिन न तो रवि को इन बातों से कोई फर्क पड़ता था न उस परिवार को.इसी बीच घर में चोरी की एक हौलनाक व रहस्यमय घटना भी हुई,जिसमे गुडिया का वह सब कुछ चोरी चला गया,जो वह मायके से लेकर आई थी.उसके बक्से,कपडे,गहने,रूपये,पैसे...यानी सब कुछ.इस एक घटना के बोझ से मेरे सब्र का बाँध अब दरकने लगा था.ऋषभ और कावेरी के आ जाने से गुडिया की ज़िन्दगी में एक ख़ुशी तो आ गयी थी,लेकिन रवि के नकारात्मक रवैये ने मुझे बौखला रक्खा था.चोरी की घटना ने मेरे मन में पूरे परिवार के प्रति संदेह भर दिया था.बाबूजी हमें कुछ भी कहने,करने से हर हालत में रोके हुए थे.बोले-चोरी हो गयी तो हो गयी,हम हैं न.उसके बक्से फिर से भर दिए बाबूजी ने,लेकिन उस परिवार की बेशर्मी ने मुझे बेचैन तो कर ही दिया था.

आखिर एक बेटी के सुख-चैन की ज़िन्दगी के लिए एक बाप को कितना करना पड़ता है,कितना बिकना पड़ता है,और कितना झुकना पड़ता है..और क्यों..?आखिर क्यों..?बेटी न पैदा की,जैसे महापाप कर डाला हो कोई और एक अंतहीन प्रायश्चित किये जा रहे हैं, किये जा रहे हैं,यही सब सोच-सोचकर मेरी नसें तड़तडाने लगती थीं जैसे.इतना सब होने के बावजूद अचानक जब उसकी सासू माँ बीमार पड़ी तो लड़की भईया-बाबा सब भूलकर उनकी सेवा में जुट गयी.बाद में पता चला कि उनको कैंसर है.बड़ी बहू पति के सात चली गयी और छोटी बहू ने सास की सेवा का जिम्मा उठा लिया.पूरे सालभर बिस्तर पर ही रहीं वे.हालत यह हुई कि वजह चाहे कुछ भी हो,उनके लिए बिस्तर से उठना संभव नही था.उन दिनों में उनके दो बेटे और एक बहू परदेस में रहे और एक गुडिया की एकनिष्ठ सेवा ने जितना हो सकता था.उतना आराम उन्हें दिया.

लेकिन उनके चले जाने के बाद घर एकदम से नंगा हो गया.लगा जैसे उस घर का पर्दा ही उड़ गया हो.उनकी मृत्यु के 1 साल के बाद चाचा के लड़के की शादी में हम गुडिया को घर ले आये.घर में बहुत भीड़ थी.शाम के वक्त छत पर गुडिया अकेली बच्चों के साथ बैठी थी.मै उसे खोजते हुए उसके पास पहुंचा तो मुझे देखते ही वह मुह बिचका-बिचका के रो पड़ी.अब उसका रोना तो मुझे मार ही डालता था.मैंने घबरा के उसे पकड़ लिया.क्या हुआ....क्या हुआ..?मैंने पूछना शुरू किया.किसी तरह जब्त करके उसके मुह से दो बोल फूंटे-भईया,मुझे मारा उन लोगों ने......अरे,इतना सुनते तो मेरे आग ही लग गयी.उस वक्त मेरी बुद्धि एकदम से फिर गयी.सब कुछ उल्टा पुल्टा हो गया.दो मिनट तक चुप-चाप उसे सहारा देता रहा,किसी तरह अपना रोना रोके रक्खा,उसके आंसू पोछे फिर नीचे भागा.बहन मुझे रोकती रही-भईया,अभी कुछ मत करिए.....

लेकिन अब सुनता कौन था.....!तीन-तीन,चार-चार सीढियां कूद कर मै नीचे आया और सीधे बाहर दरवाजे पर आकर बाबूजी के सामने चिल्ला पड़ा.बाबूजी के सामने किसी का चिल्लाना घर में एकदम नई बात थी.सामान्य मनोदशा में आँख उठाकर बात करने की हिम्मत नही पड़ती थी किसी की.मेरी आवाज़ का शोर सुन कर जैसे सनाका छा गया सबपर.पूरा घर,औरतें-बच्चे सब घर से बाहर आ गये,बाबूजी तख़्त पर बैठे चुप-चाप मेरी ओर देख रहे थे-क्या हो गया लड़के को,वे सोच रहे थे और मै चिल्ला रहा था-मार डालिए उसको,काट डालिए उसको,अरे ज़हर ही खिला दीजिये किसी तरह,जान छूटे इस लड़की से.अरे,किसलिए मर्द बने फिरते हैं हमलोग,आप की दरोगयी किस दिन काम आएगी,आपकी सिखाई मर्यादाओं के बोझ के नीचे मेरी बहन की जान जा रही है.

और आप साधू बने बैठे है..?फूंक दूंगा सारा घर और मार डालूँगा उन सालों को................हे भगवान,मुझे अब याद नही आता मैंने क्या-क्या कहा उस दिन.इस बीच बाबूजी ने खड़े होकर मुझे सख्ती से थाम लिया था,चिपका लिया था और पूछ रहे थे-क्या हुआ है..?क्या बात है कुछ बताओ तो..?इसी बीच गाय-सी कांपती हुई गुडिया भी सामने आ खड़ी हुई.और अपनी पीठ पर से साडी हटा दी------लाल-लाल साट,जो जहाँ था वो वहीँ खड़ा था,चुप-चाप,सन्नाटा-आवाज केवल गुडिया के सिसक-सिसक कर रोने की और मेरे हांफने की आती थी.गजब के धैर्य वाले थे बाबूजी लेकिन.हम सब से ज्यादा प्रिय उनको वही थी.सब उनको ही देख रहे थे.बाबूजी को जैसे काठ मार गया हो,खड़े-खड़े बेटी की पीठ सहला रहे थे और आंसू पी रहे थे.आवाज़ नही निकल पा रही थी उनकी लेकिन संभाल ही लिया उन्होंने खुद को.उसके आंसू पोछे,मेरा सिर सहलाया,सबको बटोरा,घर में आये.वह रात हम पर बहुत भारी बीती.थोडा शांत होने के बाद उन्होंने गुडिया से सारी बात विस्तार से सुनी-सास के होने तक तो ऐसी हिम्मत नही की किसी ने,

लेकिन उस दिन देवर के आदेश पर तुरंत ध्यान न देने के अभियोग में विवाद इसलिए बढ़ गया कि 'अभी-अभी' 10 साल पहले आई बहू ने देवर को जवाब कैसे दे दिया.अरे नींद आ गयी थी,तो माफ़ी मांग लेती.चचिया सास ने ललकारा था और देवर ने मारा था.गुडिया ने बताया-बाबूजी,मैंने भी भगौना खींच के मारा और चार साल के ऋषभ ने भी लोटा खींच के.
चार दिन बाद ही मेरे घर में शादी थी.लेकिन तब तक हम इंतज़ार नही कर सकते थे.उफ़......कितनी जकडन,कितना बोझ होता है अपनी-अपनी तरह के समाजों का.......!बाबूजी अब भी समझाने की मुद्रा में थे-चार दिन रुक जाओ,शादी के बाद चलेंगे और पूछेंगे.हम सत्य,अहिंसा और ज्ञान-विज्ञान सब भूल गये थे.हमने बाबूजी को जवाब दिया-हम जा रहे हैं फैसला करने,आप आइये,चाहे मत आइये...और हम चल दिए,बाबूजी भी चल दिए.रवि एक दिन पहले ही मुंबई से आया था.वहां पहुंचकर गाडी खड़ी करते ही बाबूजी के रोकते-रोकते भी हम उग्र हो गये.हमने चिल्लाकर कहा-बाहर निकलो हरामजादों.आज हम कन्यादान वसूलने आये हैं.भर्र से घर से सब के सब बाहर निकले,उसके तीनों,चारो ससुरे भी निकले,रवि भी आया.धीरे-धीरे पूरा गाँव ही इकठ्ठा होने लगा.और उस दिन हमपर बाबूजी का नियंत्रण बिलकुल नही था.वे बहुत परेशान थे.सब मिलकर मुझे ही समझाये जाते थे.और लीपापोती करने में लग गये थे.रवि भी हमसे 'शांत रहिये' की गुहार लगा रहा था.

कुछ अंदेशा पहले से सबों को था,इसलिए एक चालाकी की थी सबने.उसके देवर को कहीं छुपा दिया था.बाबूजी ने भद्र-समाज के सामने बेटी का सवाल रक्खा.भीष्म पितामहों के सिर नीचे हो गये.शब्द-व्यापार चलने लगा.गाँव वाले छि-छि कर रहे थे.गुडिया के स्वभाव,सास की सेवा और उसके व्यवहार से प्रभावित महिलाओं और उनके घर वालों ने हमारा पक्ष तो लिया लेकिन दबी जुबान से ही.इतने बड़े पंडित जी से कौन दुश्मनी ले.कुलमिलाकर बात ''छोडिये,जाने दीजिये.'' की ओर घूमने लगी.और यह बात कम से कम मेरे लिए तो बर्दाश से बाहर की थी.रवि का चाचा शकुनी मामा बना बैठा था.उसने मेरे जले पर नमक छिड़क ही तो दिया-आप तो पानी की तरह बोल रहे हैं,ये लड़का आपका बड़ा ताव खा रहा है.दूसरी शादी करेगा क्या बहन की..? वह अभागा नही जानता था कि उस दिन मेरे ऊपर काल सवार था.कुछ नही देखा,बस दौड़ कर उसको गर्दन से पकड़कर घसीट लिया धूल में और आस-पास सब कुछ भूल के सैकड़ों गालियों से उसका अभिषेक कर दिया-कर दूंगा कुत्तों.दूसरी शादी भी कर दूंगा,लेकिन अब यहाँ नही भेजूंगा.कान खोल के सुन ले,जेल में चक्की पिसवाऊंगा सबको.तब तक भीड़ ने उसको मेरे हाथ से छुड़ा लिया था.मेरे क्रोध से 'सभ्य-समाज' मेरे विरुद्ध हो गया.बाबूजी भी शर्मिंदा हुए, लेकिन मुझे कहाँ किसी की पड़ी थी.अफ़सोस ये रहा कि वो लड़का मेरे सामने नही आया,वर्ना आज हम कहीं 302 की सजा काट रहे होते.रवि भी नाराज़ था.हम बाबूजी को लिए-दिए घर आये और बहन को भी अपना निर्णय सुना दिया-नही जाना तुझे उस घर में अब.उस समय तो सबने सुन लिया,लेकिन हाय रे लड़कियों,हाय रे तुम्हारा मन......!इतने सबके बावजूद भी शादी तोड़ने के नाम पर गुडिया राज़ी नही होती थी.

कहती थी वो तो सीधे हैं,उनका क्या दोष.....!लेकिन हम भी भरी महज्जत में चुनौती देकर आये थे,सो उस घर में तो नही भेजना था,शादी भले न टूटे.मुझे समझाने वालों की संख्या सैकड़ों में थी.अम्मा,बाबूजी और गुडिया का चेहरा चुप-चाप ये काम करता ही रहता था.एक बाबूजी ही थे,जो कभी-कभी मुझे घुड़क भी देते थे-तुम कौन हो ये निर्णय करने वाले.....?और रहेगी कहाँ वो,अगर वहां नही जायेगी तो...?उधर से तो मुझे धमकियाँ भी आने लगी थीं.लेकिन इन सब बातों से बेखबर मुझे बस एक ही धुन सवार थी-गुडिया के लिए एक अच्छी-सी नौकरी की तलाश,बस..मै जानता था कि इस हालत में खुले मन की,पढ़ी-लिखी मेरी बहन के लिए एक नौकरी मिल जाए,तो उसके लिए दवा बन जायेगी.अम्मा अकेले में मुझे आशीर्वाद देती थी-तुम्हारे माथे चंदन लगे बेटा,भगवान् तुम्हारी सुन ले.हमने सब ईश्वर पर छोड़ा,हिम्मत जुटाने लगे और रास्ता तलाशने लगे.

एक और कहावत उन दिनों मेरे सिर पर हथौड़े की तरह बजाई जाती थी-अरे बेटा,दस लड़कों को पाल सकते हो,लेकिन एक बेटी का बोझ बहुत भारी होता है....माय फुट...मै दांत पीस कर निकल जाता था.करते-करते गुडिया तीन साल मायके में रह गयी,लेकिन इसी बीच ईश्वर ने मेरी सुन भी ली.मेरे हाथों गुडिया के लिए एक बढ़िया काम का जुगाड़ हो गया.अब एक नई समस्या खड़ी हो गयी.अम्मा बाबूजी मुझे इस बात के लिए समझा रहे थे कि नौकरी की व्यवस्था रवि के लिए करना ज़रूरी है.बाद में ये बात कुछ मुझे भी समझ में आने लगी.कुछ मित्रों और मेरे कुछ अजीजों ने मिलकर वह व्यवस्था भी कर दी.मैंने सन्देश भेज कर रवि को बनारस बुलवाया.

नाक मुंह फुलाए-फुलाए ही रवि ने नौकरी ज्वाइन कर ली.तीन-चार महीने बाद गुडिया को भी घर से बुला लिया और उसकी वही नौकरी उसे मिल गयी,जिसे उस समय बाबूजी ने करने नही दिया था उसे.दो स्वयंसेवी संस्थाओं में अलग-अलग नौकरी करते हुए दोनों यहीं मेरे घर में बच्चों के साथ कुछ महीने रहे.फिर यहीं 'कोनिया' में अपनी व्यवस्था जमा ली.दो साल बाद ही रवि को अनुभव के आधार पर कनाडा की एक संस्था ने बिहार में जॉब दे दी और वह मोतिहारी चला गया.गुडिया यहाँ अपने बच्चों के साथ फिर अकेली छूट गयी.कहने लायक एक ख़ास बात ये कि मेरे अनुभव बताते हैं कि औरतों में संघर्ष करने का माद्दा पुरुषों से अधिक होता है.पिछले 6 सालों में गुडिया ने फिर एकाकी जीवन ही जिया.बच्चों की परवरिश और अपनी नौकरी के साथ ताल-मेल बनाते-बिठाते,यहाँ-वहां दिन-दिनभर भागते अथक श्रम करते मैंने अपनी ही छोटी बहन को लगातार देखा..लगातार देखा.रवि महीने में एक बार बनारस आते रहे और गुडिया का संघर्ष चलता रहा.इसी दौरान,इन्ही संघर्षों के बीच बाबूजी को अंतिम बीमारी ने घेरा.हम सब बाबूजी को क्षीण होते और विदा लेने की तैयारी करते निरीह भाव से देखते रहे.अपने अंतिम दिनों में जीभ के कैंसर से घायल बाबूजी बोल नही पाते थे.एक दिन जब हम घर में नही थे तो वे गुडिया के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये.लटपटाती जुबान से कहा था-हमने तेरे साथ गलती कर दी.वह रो पड़ी-बाबूजी, ऐसा मत कहिये,आपकी ये बातें सुनकर और आपका यह चेहरा याद कर के हम कैसे जियेंगे.तब बाबूजी ने कागज़ पर लिखकर उसे चुटका पकड़ाया.लिखा था-भईया है न.
ओह......गला रुद्ध हुआ पड़ा है.कलम चलती नही है लेकिन अपनी ही बहन के साथ आज मेरी कलम को न्याय करना है तो रुकूँ कैसे.उम्मीदों और विश्वासों का कितना सारा बोझ मेरे सिर पर छोड़कर बाबूजी तो चले गये.गुडिया और रवि की गृहस्थी संवारने में दोनों ने बहुत मेहनत की.बच्चे बड़े हो गये,रवि ने भी खूब तरक्की की.अभी एक महीना पहले उनकी ऑफिस ने एक और प्रमोशन देकर उनको बक्सर भेजा तो शाम को गुडिया मिठाई लेकर घर आयी,हमने पूछा-ई का रे..?बोली-भईया अब नौकरी नही करेंगे हम,उसी की ख़ुशी में मिठाई खिलने आये हैं.पूरी बात सुनी तो दिल भर आया.बोली हम बक्सर जा रहे हैं.हंस रही थी,रो रही थी,खुश थी,उदास थी....लेकिन आपसब मेरी ख़ुशी का अंदाज़ा लगाइए जब उसने मुझसे कहा-हम साल,दो साल में लौटकर फिर बनारस ही आयेंगे.मेरे लिए एक बिस्सा ज़मीन खोज कर रखियेगा भइया.

मैंने पूछा-इतना जमा कर लिया क्या रे..?तो बोली-सब आप ही का किया-धरा है,हम क्या जमा करेंगे.इन्ही बीते सालों में वह समय भी आया और गया जब सबके साथ-साथ गुडिया भी मुझे समझाने लगी कि भईया घर से क्या दुश्मनी है.घर छोड़ देना कौन-सी समझदारी है.तन के कितने दिन रहा जा सकता है.बीती बातें भूलनी भी चाहिए.गुस्सा कब तक पालेंगे..?अब मै उसे क्या बताता,कि इसी गुस्से के बल पर तो मै उसे ये छोटी सी दुनिया दे पाया हूँ.खुद पर ही हंसी आ जाती और वह इधर मुझे समझाती जाती,उधर अपने टूटे छूटे रिश्ते आ-जा कर संजोती जाती,संभालती जाती.जिस बात के लिए मैंने बाबूजी की भी एक न सुनी,उस बात के लिए मैंने उसके सामने,उसी की ख़ुशी के लिए हथियार डाल दिए.

उसे हर बार मुझसे इजाज़त लेनी पड़ती थी.मैंने एक लाइन में अपनी बात कह दी-देख गुडिया,तेरे ही खुशी और सम्मान के लिए वह घर छुड़ाया था तुझसे.बाबूजी दुनिया से चले गये लेकिन वहां फिर कभी नही गये.अगर तेरी ख़ुशी के लिये मुझे वहां भी जाना पड़े तो कभी जाऊँगा ही.तेरी तो किस्मत ही उस घर से बंधी है,मै कबतक रोकूंगा..जाओ.आपको बताऊँ कि उसने अपना सबकुछ संभाल लिया.मैंने सुना,रवि ने अपने भाई को बुलाकर उससे माफ़ी भी मंगवाई.सब ठीक हो गये.सब एक हो गये.लेकिन ये भी सुनता हूँ कि अब जब गुडिया उस घर में जाती है,तो लोग उससे डरते भी हैं,उसका सम्मान भी करते हैं.उसके ससुर अंतिम दिनों में अपनी पत्नी की सेवा के लिए उसके एहसानमंद भी होते हैं.और अपनी सबसे लायक बहू बताते नही थकते हैं,अलबत्ता मेरे साथ उनका कोई रिश्ता अब भी नही है.अपनी नौकरी के दौरान गुडिया ने देश खूब घूमा,दिल्ली से मदुरई तक तमाम शहरों में महिलाओं के मुद्दों पर कई मंचों से उसने खूब भाषण दिए.उसकी ख़बरों और चित्रों वाले अखबारों की कटिंग्स से बनी उसकी फ़ाइल देख कर उसके गाँव में बड़ी-बूढ़ियाँ कहती हैं-दरोगा की बेटी है,पढ़ी-लिखी है,चूल्ह पोतने के लिए थोड़ी न भेजा था उसके बाप ने वगैरह....वगैरह...वगैरह....वगैरह.....!!

ये थी वो कहानी,जिसका मैंने वादा किया था आपसे.अपने इन्ही अनुभवों से गुजरने के बाद मैंने कभी लिखा था कि घर की पुरानी औरतों और नयी बहू के बीच जो दो पक्ष बन जाते हैं,उसमे दोनों के औरत होने के बावजूद ये जो शोषण का रिश्ता बन जाता है,उसे देखकर बहुतायत में लोगों को यह कहते सुना जाता है कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है.वास्तव में ऐसा होता नही.जब हम कहते हैं कि औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन है,तो जाने अनजाने एक बड़ा अपराध कर गुजरते हैं,औरत की लड़ाई को कमजोर कर देते हैं.थोड़ी बारीकी से देखें तो इस मर्दवादी किस्म की बात का अर्थ समझ में आएगा.गुलामों की परम्परा को जरा करीब से देखिये.जमींदारों के घर जो हरकारे,नौकर होते थे..

वो उन्ही गांवों,समाजों से होते थे,जिनपर जमीदारों का जुल्म कहर बन के गिरता था..अपने ही समाज और अपने ही लोगों पर ये लोग जमींदारों को खुश करने,उनकी कृपा हासिल करने के लिए उनसे आगे बढ़ के कहर ढाते थे..लेकिन यहाँ आप ये नही कह सकते कि गाँव वाले ही गाँव वालों के दुश्मन होते थे..असल अपराधी तो वो था,जिसके कृपापात्र बने रहने और अधिक से अधिक लाभ पाने के लिए उसके करीब रहने वाले लोग अपने ही लोगों को सताते थे...एक और उदाहरण से समझें....जलियांवाला बाग में आन्दोलनकारियों पर गोली चलाने वाले सिपाही हिन्दुस्तानी ही थे.अंग्रेज जनरल ने तो केवल आदेश दिया था...तो क्या हम कह सकते हैं कि हिन्दुस्तानी ही हिन्दुस्तानी के दुश्मन थे....??ठीक उसी तरह यह नही कहा जा सकता कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है...ये केवल बड़े गुलाम और छोटे गुलाम वाला मामला है..ये बड़े गुलाम मर्द साहबान के करीब होते हैं और उनकी नज़रे इनायत पाने के लिए छोटे गुलामों पर कड़ी नजर रखते हैं,बस इतनी सी तो बात है..औरत औरत की दुश्मन है,ये कहने से लड़ाई में कमजोरी आती है...

एक बात मुझे ये भी लगती है कि किसी लड़की के वैवाहिक जीवन में इस तरह का जो अंतहीन दर्द आता है,उसकी जिम्मेदारी निर्विवाद रूप से उसके पिता और भाई पर आयद होती है... इस समस्या की जड़ें हमारे ही स्वार्थ के अंधे कुँए में कहीं हैं.इस बात से मै पूरी तरह सहमत हूँ कि शादी के नाम पर एक घरेलू नौकरानी का इंतजाम करने वाले समाज के रहवासी हैं हम.तीन किस्म की गुलामी में घेरते हैं हम अपनी बेटियों को.उसका विवेक निर्णयात्मक हो,इसके लिए उसे पर्याप्त शिक्षा नही देते..उसका आत्विश्वास मज़बूत हो,इसके लिए उसको अपने फैसले खुद करने की आज़ादी नही देते..और वह खुद आत्मनिर्भर हो सके,इसके लिए अपनी जायदाद में हिस्सा नही देते...और बस समस्या की जड़ यहीं है.हम ये कह के मुक्त हो लेते हैं कि बेटी तो ससुराल से भी पाती ही है.क्या पाती है बेटी ससुराल से...?जो दहेज़ लेकर किसी की बेटी ले जाते हैं,वे क्या जायदाद देंगे उसे...?पिता और भाई होने के नाते हम खुद अपनी बेटियों को जो देने का स्वांग करते हैं.....

दान,दहेज़,नेग,वगैरह,मै तो कहता हूँ कुछ मत दो.केवल अच्छे से पढ़ा दो भाई..और जैसे बेटों में बांटते हो,जमीन और घर का एक हिस्सा और लगा दो...खाली जुबानी जमाखर्च नही,कागज़ पर...जिस दिन बेटी के पास ससुराल से पलटकर वापस आने का एक अपना रजिस्टर्ड ठिकाना होगा,अपना एक घर होगा,उस दिन डोली-अर्थी के चक्रव्यूह से वह मुक्त हो जायेगी, जिस दिन बुरे वक़्त में सहारा बनने के लिए उसके पास अपने रिश्ते और अपनी आर्थिक व्यवस्था होगी, उसी दिन से वह आत्मसम्मानी, आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर हो जायेगी..पत्नी और बहू के साथ व्यवहार करना अगर हमे नही आता,तो यही कर डालो...बेटियों की आँख के आंसू तो सूखें....हर पिता से मेरा आग्रह है कि आप दीजिये अपनी बेटी को वो सारे हक.उसके सारे अधिकार.

बेटी न हो तो भतीजी को दिलवाइए.किसी एक भी बेटी को अगर आप उसके बाप की हैसियत में से उसका हिस्सा दिलवा सके...तो समझ लीजिये हजारों,लाखों बेटियों,बहनों,लड़कियों के हक़ की लड़ाई को दिशा मिल जाएगी...मै अपनी बेटी के नाम अपने घर और ज़मीन में उसके दोनों भाइयों के साथ १/३ हिस्सा दूंगा.ये मैंने सबको बता रखा है.. औरतों को लड़ना होगा,लड़ना होगा,ये कह के तो हम आखिरी उम्मीद भी ख़त्म कर देते हैं..अरे उसका सत्यानाश तो हमने कर रखा है.....तो वो क्यों लड़े..लड़ना तो पुरुषों को ही चाहिए औरत के हक की लड़ाई...मैंने लड़ी है दोस्त अपनी बहन के हक की लड़ाई..अभी बहुत कुछ बाकी भी है,जानता हूँ मै...

Tuesday, March 4, 2014

पानियों पे छींटे उडाती हुई लड़की...-

प्रकृति के नियमों के साथ जितना खिलवाड़ गुलज़ार साहब ने किया है उतना शायद ही किसी और ने किया होगा. उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से कुदरत को बेतहाशा तोडा मरोड़ा है. उनके गीतों में कुछ भी नियम कायदे से नहीं चलता. कभी चाँद जमीन पर भटक रहा होता है तो कभी सितारे क्यारियों में उगे हुए होते है. कभी समंदर सहराओं की ख़ाक छानता है तो कभी हवा चिराग को रौशन रखे होती है. वो अल्फाजों को सूंघ सकते है, आंसुओं को सुन सकते है और खुशबुओं को देख सकते है. कुल मिलाकर वो कुछ भी कर सकते है. और सच्चे कलाकार की इससे बढ़कर और क्या पहचान होगी कि कुदरत का निजाम भी उसके अल्फाजों की मर्ज़ी से चले.
एक बेइंतहा खूबसूरत गीत में उन्होंने लिखा की,

‘हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू, हाथ से छू के इसे रिश्ते का इल्जाम ना दो.’

और उसी रोज़ से हर एक बशर आँखों की खुशबू देखने का दावा करने लगा. और उस खुशबू को हाथ से छूने की गुस्ताखी करने से परहेज भी करने लगा. एक और गीत में उन्होंने लिखा कि,

‘आ धूप मलूं मैं तेरे हाथों में,
आ सजदा करूँगा मैं तेरे हाथो में.’

बताओ तो ? हाथों में धूप मलने का आखिर क्या मतलब हुआ ? आखिर ये बंदा एक्झैक्ट्ली करना क्या चाहता है ? कभी आया है मन में सवाल ? नहीं ही आया होगा. क्यूँ कि हम जानते है, अगर गुलजार साहब कह रहे है तो ये सब किया ही जा सकता होगा.

जब मैं छोटी बच्ची थी तब टीवी पर एक फिल्म का ट्रेलर आया करता था. हु तू तू फिल्म का. इसका एक गाना बार बार दिखाया जाता था. गाना बेहद उम्दा था. जिसके बोल कुछ इस तरह थे,

‘छई छप्पा छई, छप्पाक छई, पानियों पे छींटे उडाती हुई लड़की...
अरे देखी किसी ने, आती हुई लहरों पे जाती हुई लड़की.’

उस कच्ची उम्र में इस गीत को सुनकर मेरी पक्की धारणा हो चुकी थी कि ये कोई भूत-प्रेत की फिल्म है. और ये लहरों पे आने-जाने वाली लड़की जरुर जरुर कोई चुड़ैल होगी. वो तो काफी सालों बाद पता चला कि फिल्म एक पोलिटिकल थ्रिलर थी और लहरों पे लड़की चलाने का कारनामा गुलजार साहब का था.

जब वो कहते है कि, ‘कतरा कतरा मिलती है, कतरा कतरा पीने दो, ज़िन्दगी है’, तो इस फानी दुनिया का हर एक बाशिंदा ज़िन्दगी की प्यास को लबों पर सजाये हुए उनके हमकदम हो लेता है. बगैर कोई सवाल जवाब किये. जब उनके किसी गीत की विरहिणी नायिका कहती है कि, ‘और मेरे इक ख़त में लिपटी रात पड़ी है, वो रात बुझा दो, मेरा वो सामान लौटा दो’, तो उसके दर्द की शिद्दत से हर एक सुनने वाला अच्छी तरह वाकिफ हो जाता है. जिसने अपनी रातें ही ख़त में लपेट कर भेज दी वो कितनी तनहा होगी इसका अंदाज़ा एक लाइन में ही लग जाता है.

लिबास फिल्म के गीत ‘खामोश सा अफसाना’ में एक जगह वो लिखते है कि,

‘कितने साहिल ढूंढें, कोई ना सामने आया,
जब मझधार में डूबे, साहिल थामने आया.’

तब डगमगाती कश्तियों के मुसाफिरों की भी हिम्मत बंधने लगती है कि कभी तो, कोई तो आकर थामेगा ही. भले ही साहिल बीच मझधार आये. इसी फिल्म के एक अन्य गीत ‘सिली हवा छू गई’ में उनकी नायिका कहती है,
‘तुम से मिली जो ज़िन्दगी, हम ने अभी बोई नहीं’, जैसे ज़िन्दगी ना हो उम्मीदों का कोई बीज हो जिसे बो देने भर से ही एक नई ज़िन्दगी का पौधा फलने-फूलने लगेगा. इसी उम्मीद की तो जरुरत होती है हम सब को. और गुलजार के गीतों में ये बहुतायत में पाई जाती है. यूं जैसे उम्मीदों का कोई पेड़ लगा हुआ हो. जब भी नाउम्मीदी दस्तक देने लगे, गए और इस पेड़ की शाख से कोई उम्मीद तोड़ ली.

जब उन्होंने समझाया ‘दिल तो बच्चा है जी’ तो पूरा मुल्क इसे ब्रह्मवाक्य मानकर इस पर अमल करने लगा. जब उन्होंने बोला कि, ‘दोनों तरफ से बजती है ये, आय हाय ज़िन्दगी क्या ढोलक है’, तो सब को गुमान हुआ की ज़िन्दगी कितनी मुश्किलातों से भरी हुई है.

साथिया फिल्म के एक गाने में जब उनका नायक अपनी महबूबा की हंसी को ‘गीली हंसी’ बताता है और उस हंसी को ‘पी जाने का’ दावा करता है तो वो नजारा हमारे खयालों में एक सूरत सी अख्तियार कर लेता है. इसी फिल्म के एक गीत ‘ऐ उडी उडी’ में हीरो अपने प्रैक्टिकल होने का क्या खूब सबूत देता है. वो कहता है,
‘लड़ लड़ के जीने को ये लम्हे थोड़े है
मर मर के सीने में ये शीशे जोड़े है
तुम कह दो सब ला दूं, बस इतना सोचो तुम,
अम्बर पे पहले ही सितारे थोड़े हैं.’
इसी फिल्म के एक और बेहद मधुर गीत ‘चुपके से’ में नायिका कहती है,
‘दिन भी ना डूबे, रात ना आये, शाम कभी ना ढले,
शाम ढले तो सुबह ना आये, रात ही रात चले.’
ये पढ़कर भी ऐसी कन्फ्यूज बंदी पर हमें गुस्सा आने की बजाय प्यार ही आता है.

अपने गीतों के जरिये सम्पूरण सिंह कालरा उर्फ़ गुलजार साहब क्या क्या कर सकते है या करवा सकते है इसकी एक झलक देख लीजिये.

--- वो आपसे चिंगारी का टुकड़ा जलाने को या सहरा की प्यास बुझाने को कह सकते है ( बहने दे, मुझे बहने दे – रावण )
--- वो आपको हुक्म दे सकते है कि जाओ रौशनी से नूर के धागे तोड़ लाओ. ( बोल ना हलके हलके – झूम बराबर झूम )
--- वो आपको समझा सकते है कि बारिश का भी बोसा (चुम्बन ) लिया जा सकता है. ( बरसो रे मेघा – गुरु )
--- वो आपको दिल निचोड़ने के लिए, रात की मटकी तोड़ने के लिए उकसा सकते है. ( आजा आजा दिल निचोड़े – कमीने )
--- वो आपको बहका सकते है कि सांस में सांस मिलने पर ही सांस आती है. ( सांस – जब तक है जान )
--- वो आपको काफिर घोषित करवाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ेंगे जब आप उनका लिखा ये गायेंगे, मेरा नगमा वही, मेरा कलमा वही. ( चल छैंया छैंया – दिल से )
--- वो ‘तू मेरे रूबरू है, मेरी आँखों की इबादत है’ लिखकर आपकी मदद भी कर सकते है. जब भी आपका महबूब/महबूबा आपसे खफा हो जाए, ये गीत चिपका दीजिये. नतीजा यकीनन सुखद निकलेगा.

गुलजार साहब के गीत सिर्फ गीत ना होकर जीने का फलसफा संजोये हुए नगीने है. उनका हम जैसी भटकती, तड़पती रूहों पर बेशुमार एहसान है. जिसको कभी भी चुकता नहीं किया जा सकता. खुदा आपकी उम्र दराज करे गुलजार साहब. ताकि आप यूं ही हमारी जिंदगियों को अपने अल्फाजों की खुशबू से महकाते रहे. आमीन !

जब भी गहरे अवसाद में घिर जाती हूँ तो गुलजार साहब के इस गीत से ताकत हासिल करने की कोशिश करती रहती हूँ,

पहले से लिखा कुछ भी नहीं,
रोज़ नया कुछ लिखती है तू
जो भी लिखा है, दिल से जिया है
ये लम्हा फिलहाल जी लेने दे
हाँ ये लम्हा फिलहाल जी लेने दे....

आप भी जी रहे है न ये फिलहाल वाला लम्हा ???


- ज़ारा अकरम खान

Saturday, January 25, 2014

मुखौटा- ज़ारा अकरम खान

~~~~~~~~~मुखौटा~~~~~~~~

उसे पहली बार मेरा पांच साल का भांजा आमिर लाया था । तब, जब वो लोग कलियर जाते हुए हमारे यहाँ रुके थे । लिजलिजी रबड़ से बना भयंकर सा मुखौटा । सुर्ख दहकती हुई आँखें, चेहरे पर अजीब से रंगों का मिश्रण और डरावनी मुद्रा । पहली बार जब आमिर उसे पहने हुए अचानक सामने कूदा था तो मेरी चीख निकल गई थी । दिल उछल कर हलक में आ गया था । कितनी ही देर लगी थी अपनी बेतरतीब साँसों पर काबू पाने में । अगर वो हमारे यहाँ मेहमान नहीं होता तो एक मारती खींचके । लेकिन मेहमान नवाजी का और बच्चे की उम्र का खयाल कर के चुप लगा गई थी । मुझे याद है आमिर कितना खुल कर हंसा था मेरे डरने से । उसकी निगाह में एक बच्चे द्वारा किसी बड़े को डराना बहुत बड़ा काम था । बहुत खुश हुआ था वो अपनी हरकत पर । जो दो दिन वो लोग हमारे यहाँ रुके, उसने कई बार मुझे वो मुखौटा पहन कर डराया । पहली बार के बाद मेरा डर तो निकल गया था लेकिन मैं आमिर की ख़ुशी के लिए डरने का नाटक करती रही । उसे झूठ मूठ का डांटती भी रही । वो बहुत खुश होता था । फिर वो लोग चले गए और मुखौटा रह गया । पता नहीं आमिर उसे ले जाना भूल गया था या उसने उसे जानबूझकर मेरे लिए छोड़ा था । लेकिन उनके जाने के बाद मुझे वो बैठक में मिला । मैंने उसे उठाकर अपने कमरे में अपनी मेज़ की दराज़ में रख दिया । दो दिनों में उसकी आदत तो हो चुकी थी लेकिन रात में उसकी तरफ देखने से अब भी हल्का सा डर लगता ही था ।

दिन बीतते गए और मैं मुखौटे को भूलती गई । वैसे भी याद रखने के लिए बहुत सी चीजें थी ज़िन्दगी में । जैसे की तुम । हाँ तुम, अर्श अहमद खान । तुम्हें याद करना, तुम्हें सोचना एक अलग ही दुनिया में ले जाता था मुझे । तुम्हारे होते हुए मुझे वक्त हमेशा कम पड़ा करता था । उस अनजानी सी कशिश को कभी लफ़्ज़ों में पिरोने की कोशिश तो नही की मैंने लेकिन बहुत कुछ ऐसा ज़हन में उमड़ता रहता था जिसे बाहर निकालने की कोशिश में मैं अधमरी हुई जाती थी । मेरी बातें सुनकर तुम पूछा करते थे कि तुम ऐसी किताबी बातें कैसे कर लेती हो ? और मैं हमेशा मुस्कुराके यही कहती थी के बहुत किताबें पढ़ती जो हूँ । हाँ अर्श अहमद खान मैं बहुत किताबें पढ़ती थी, अब भी पढ़ती हूँ । तुम्हारे बाद भी । आखिर उन्ही से तो सीखा है मैंने लहजे पहचानना । बातों के पीछे छिपी हुई बात जानना । अगर ऐसा ना होता तो उस दिन तुम्हारी बातों को अन्दर तक पढने में कामयाब हो पाती भला ?

मुझे आज भी लम्हा लम्हा याद है वो दिन जब तुम आखिरी बार हमारे घर आये थे । तुम्हे आये हुए बहुत दिन बीत चुके थे । इतने ज्यादा के अब तुम्हारे आने की उम्मीद भी करनी छोड़ दी थी मैंने । और ऐसे में अचानक तुम आये । तुम्हें देखकर पता नहीं क्यूँ उस एक बार दिल की धड़कनें काबू में रही । जब कि हमेशा वो एकाध बीट मिस कर दिया करती थी । पता नहीं क्यूँ वो बेचैनी,वो बेताबी नदारद थी । शायद पिछले दिनों की तुम्हारी बेरुखी का असर हो । तुम्हारे आते ही मैं हमेशा की तरह किचन की तरफ मुड़ी और हमेशा की तरह अम्मी ने रोक दिया कि मैं देखती हूँ, तुम अर्श से बातें करो । क्या वो कुछ जानती थी ? ये माएं भी ना बड़ी अजीब शय होती है । अपनी औलादों के बारे में इन्हें सब पता होता है । बिना कुछ बताये भी । हमेशा की तरह तुम और मैं आमने सामने बैठे थे । तुम उस सोफे पर, मैं इधरवाले पर । बीच में लम्बी सी शीशे की मेज । तुम जब भी आते बैठने का यही सिस्टम जारी रहता । उस दिन बहुत देर तक एक बेचैन खामोशी हवा में तैरती रही । फिर मैंने ही बात शुरू की थी ।

“बहुत दिनों बाद आये आप । क्या बात है, आप बेज़ार है मुझसे ?”

“नहीं । नहीं तो…” – तुमने हडबडाकर कहा था – “बेज़ार क्यूँ होने लगा ? बस मसरूफियत ही इतनी बढ़ गई है के वक्त ही नहीं निकल पाता । तुम तो जानती ही हो ।”

हाँ, मैं तो जानती ही थी । वो हर तीसरे दिन तुम्हारा मेरे घर बहाने बहाने से आ धमकना, वो समीरा बाज़ी के फ़ोन पर बार बार फ़ोन करके बात करवाने की गुजारिशें करना, वो ‘तुम तो मुझे वक्त ही नहीं देती हो’ वाली शिकायतें करना । सब जानती थी मैं । ये भी की आजकल तुम्हारी तरफ से बनाई गई इस दूरी की वजह क्या है । एक लम्हें को दिल चाहा ये सब कह दूं लेकिन फिर संभाल ही लिया खुद को ।

“हाँ जानती हूँ । आपकी जॉब का क्या हुआ ?”

“हो जाएगा । एक जगह बात चल रही है । इस बार पक्का है । शायद देहरादून जाना पड़े ।”

“ओह, तो और क्या सोचा आगे आपने?” – मैंने पूछा ।

“किस बारे में ?”

किस बारे में ? हाँ ये भी तो ईक सवाल है । किस बारे में सोचते तुम । अपनी नौकरी के बारे में, अपनी मसरूफियत के बारे में या…..या मेरे बारे में। मेरे बारे में क्यूँ नहीं सोचते तुम ? होठों पर रेंग रहे इस सवाल को बाहर फेंकना इतना तकलीफदेह क्यूँ हो गया था ? अब भी सोचती हूँ तो जवाब नहीं मिलता । पता नहीं बेहिसाब बोलने वाली मैं उस लम्हे इतनी चुप क्यूँ हो गई थी । बहुत देर तक एक चीखती हुई खामोशी छाई रही माहौल में । फिर तुमने ही उसे तोडा ।

“घरवाले शादी पर जोर दे रहे है।” – तुमने थैली से खरगोश बाहर निकाल ही लिया था ।

“हूँ ।” – मेरी शांत प्रतिक्रिया से तुमसे ज्यादा मुझे हैरानी हुई थी ।

तुम गौर से पढना चाह रहे थे मेरे चेहरे पर दर्द की लकीरें । और मैं इस कोशिश में थी कि दिल के ज़ज्बात चेहरे पर ना झलकने पाए । जीत शायद मेरी ही हुई थी । तभी तो तुमने झुंझलाकर कहा था,

“कुछ कहोगी नहीं ?”

“क्या कहूँ ? मेरे कहने लायक कुछ बचा है ?” – मेरा सीधा सवाल शायद तुम्हे कुछ असहज कर गया था । मुझे खुद पर ही गुस्सा आने लगा । तुम्हें आजमाइश में डालना मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगा ।

“मैं तुम्हारा गुनाहगार हूँ शाद ।” – तुम्हारी आवाज़ शायद तुम्हें भी अजनबी लगी होगी ।

“ऐसी कोई बात नहीं है । लेकिन अगर बात चल ही निकली है तो बताइये की क्यूँकर आपका और मेरा साथ नहीं बन सकता ?” –थोड़ी सी कोशिश अपने लिए भी कर के देखना मेरा फ़र्ज़ था । भले ही नाकामयाबी की गारंटी हो ।

“पापा ने कमिट किया हुआ है उनके दोस्त से । वो कभी नहीं मानेंगे । मेरे हाथ में कुछ नहीं है ।” – वही स्टैण्डर्ड जवाब ।

जुबां पे आया हुआ सवाल कि ‘प्यार क्या पापा से पूछकर किया था’ कितनी मुश्किलों से हलक के अन्दर धकेला था इसका तुम्हें अहसास भी नहीं हुआ था । कुछ पल के लिए तो दिमाग सुन्न हो गया था और ज़हन समीरा बाज़ी की बातों की तरफ चला गया था ।

‘तुम समझती क्यूँ नहीं शाद, अर्श तुमसे शादी कभी नहीं करेगा । तुमसे शादी कर के उसे सिर्फ बीवी हासिल होगी । लेकिन जहाँ उसके घरवाले उसकी शादी करा रहे हैं वहां उसे बीवी के साथ साथ एक अच्छी नौकरी और सब ठीक रहा तो राजनीति में करियर का सुनहरा मौका मिलेगा । उसके होने वाले ससुर एक बड़े नेता के करीबी है और उनका अपने दामाद को राजनीति में उतारने का इरादा है ।इस बार के पंचायती चुनाव में हो सकता है अर्श को मौका मिले । ये एक बेहद लुभावना ऑफर है जिसे अर्श कभी नहीं छोड़ेगा । तुम चाहे मानो या ना मानो लेकिन अर्श कितना सेल्फिश है ये मैं जानती हूँ । वो तुम्हें छोड़ देगा लेकिन ये मौका नहीं जाने देगा।’ समीरा बाज़ी की आवाज़ कानों में गूँज रही थी । हालांकि उस आवाज़ पर मैंने ना तब यकीन किया था और ना ही अब करना चाहती थी । मगर क्या तुम इसे सच साबित करने आये थे अर्श ? समीरा बाज़ी तुम्हारी भाभी थी । तुम्हारे घर में ही रहती थी । तुम्हारे घरकी सब बातें उन्हें पता होना लाज़मी था । झूठ बोलने वाली या बेवजह किसी का बुरा चाहने वाली भी वो नहीं थी । ख़ास तौर पर मुझ से तो उन्हें बहुत दिली लगाव था । अब भी है । वो अगर कुछ कहती थी तो उनकी बातों को मुझे संजीदगी से लेना ही चाहिए था । लेकिन अर्श, ये जो उम्मीद है न, बड़ी ही ज़ालिम शय है । ब्लड कैंसर के आखिरी स्टेज पर पहुँच चुके शख्स को भी ज़िन्दगी से चिपके रहने पर मजबूर करती है ये उम्मीद । मुझे भी क्या इसी उम्मीद की उम्मीद ने नाउम्मीद होने से रोका था ? ओह, फिर किताबी बात कर दी मैंने । यूं बहक जाना आम बात हो गई है अब । फर्क सिर्फ इतना है की अब कोई टोकने वाला नहीं रहा । अब भी इस सवाल से परेशान हूँ कि उस दिन क्या तुम मेरी उम्मीद का मुर्दा गहरा दफ्न करने आये थे ?

“कहाँ खो गई ?” – तुम्हारे सवाल ने मुझे वापस उस कमरें में लौट आने पर मजबूर कर दिया था ।

“कहीं नहीं ।” – मेरा मुख़्तसर सा जवाब ।

“तुम मुझे माफ़ नहीं करोगी ना कभी ?” –  तुमने आवाज़ में भरसक शर्मिंदगी घोलने की कोशिश करते हुए पूछा था ।

और तुम ये कभी नहीं जान पाओगे की तुम्हारे इस सवाल ने मेरे अन्दर कितने विस्फोट कर दिए थे । ये सवाल सिर्फ सवाल नहीं था । ऐलान था इस बात का कि तुमने अपनी मंजिल चुन ली थी । तुमने अपना सफ़र शुरू भी कर दिया था । और तुम मुझे शायद सिर्फ इत्तला देने आये थे । ये जताने आये थे कि तुमने जो राह चुनी है उसपर तुम्हें तुम्हारी मर्ज़ी के खिलाफ धकेला गया है । लेकिन क्या ये सच था अर्श ? क्या तुम चाहते तो हमारा साथ मुमकिन नहीं होता ? समीरा बाज़ी हमारे खानदान से थी और तुम्हारे घर में खुश थी । दोनों खानदान एक दूसरे से अच्छी तरह वाकिफ थे । हमारे यहाँ से एक और लड़की ले जाना तुम्हारे घरवालों को बिलकुल भी नागवार नहीं गुजरता । अगर तुम जिक्र चलाते तो तुम्हारे पापा यकीनन मान जाते । अहमद अंकल एक नेक और रहमदिल शख्स रहे हैं । उन्हें अपनी ही चलाते हुए मैंने कभी नहीं देखा । समीरा बाजी कहते नहीं थकती कि उन्होंने उन्हें कभी बाप की कमी महसूस नहीं होने दी । अगर तुम अपनी पसंद जाहिर करते तो थोड़ी सी कोशिशों से ये मुमकिन हो जाता। तो क्या ये तुम थे अर्श जिसने अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उनकी किसी फर्जी कमिटमेंट का सहारा लिया था ? क्या ये तुम थे जिसे एक उज्ज्वल भविष्य के लिए मेरी कुर्बानी सस्ता सौदा लगी थी ? ये और इस जैसे न जाने कितने सवाल ज़हन को कुरेद रहे थे । लेकिन तुम्हें शर्मिंदा करना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा ।

“बोलो न, क्या कभी मुझे माफ़ नहीं कर सकोगी ?” – तुम व्याकुलता की प्रतिमूर्ति बने अपना सवाल दोहरा रहे थे ।

“ऐसी कोई बात नहीं है । जो किस्मत में लिखा होता है वही होता है । इसमें किसी का क्या दोष ?” – बड़ी सफाई से जवाब दिया था मैंने । अन्दर की हलचल का अक्स चेहरे पर आने दिए बगैर । जब शिद्दत ज्यादा ही महसूस हुई तो ‘अम्मी कहाँ रह गई, देखकर आऊँ’ कहकर मैं उठ के चल दी थी । अन्दर के कमरे में जाकर खुद को व्यवस्थित किया था । और फिर वो लम्हा आया । वो लम्हा, जिसने मुझे समझाया की मुझ से मिलने तुम एक मुखौटा पहनकर आये थे । उदासी का मुखौटा, फर्जी शर्मिंदगी का मुखौटा । जब मैं वापस आ रही थी मैंने देखा की तुम अपनी दोनों आँखें जोर जोर से मसल रहे थे । ताकि वो सुर्ख हो जाती । मैंने तुम्हें थोडा वक्त दिया और पैरों की आवाज़ करती हुई लौटी ।

“आ रही है चाय ।” मैंने बताया। और दिल थाम के इन्तजार करती रही । इस बात का कि अब तुम कुछ कहोगे और मेरे शक को सही साबित कर दोगे । या फिर इस बात का कि तुम कुछ नहीं कहोगे और मेरे यकीन का मान रखोगे । लेकिन वो मनहूस दिन शायद सभी हिसाब एक ही झटके में करने पर आमादा था । तुमने कह ही दिया,

“शाद, मैं इतना परेशान हूँ कि कई रातों से सो नहीं पा रहा हूँ । देखो मेरी आँखें कितनी लाल हो रही है । ये बेतहाशा रोने की वजह से है । मैं तुम्हें कैसे बताऊँ कि मैं तुम्हारे बगैर जीने का तसव्वुर भी नहीं कर सकता था । लेकिन हालात ने मुझे मजबूर कर दिया । मुझे माफ़ कर दो।”

तुम्हें ये जानकर अजीब लगेगा अर्श के मुझे उस संजीदा घडी में भी मज़ाक सूझ गया था । मैं तुमसे कहने वाली थी के अब किताबी बातें कौन कर रहा है ? लेकिन फिर सोचा इससे तुम्हारे मुखौटे का रंग उड़ जाएगा । मैंने कुछ नहीं कहा । सिर्फ तुम्हें देखती रही थी । और तुम चेहरा ग़मगीन दिखाने के चक्कर में अजीब अजीब तरह की मुद्राएं बनाने लगे थे ।

फिर अम्मी आ गई और उन्होंने तुम्हे उस उलझन से निजात दिलाई । फिर तुमने चाय जैसे तैसे ख़त्म की । अम्मी से कुछ रस्मी बातें की और चले गए । उसके बाद तुम कभी नहीं लौटकर आये । हाँ, तुम्हारी शादी का कार्ड जरुर आया था । सुनहरे हर्फों में लिखा तुम्हारा नाम मैं देर तक छूती रही थी । अर्श वेड्स सना । कितना अजीब लग रहा था वो पढना । एक मज़े की बात बताऊँ ? तुम्हारी बीवी का नाम देखकर मुझे एक बेकार सी तुकबंदी भी सूझी थी । ‘तुम्हें मिल गई सना, और हम हो गए फना ।’ कैसी है ? बेकार है न ? समीरा बाज़ी भी यही बोली थी ।

खैर, उसके बाद की घटनाएं बड़ी जल्दी जल्दी हुई । तुम्हारी शादी हो गई । तुम देहरादून चले गए । गाहे बगाहे तुम्हारी ख़बरें मिलती रही और मैं उन्हें बिना कोई दिलचस्पी दिखाए सुनती रही । मैं फिर से अपनी किताबों की दुनिया में लौट गई । इस बार और शिद्दत के साथ ।

तुम्हें बताना नहीं चाहती के उस दिन तुम्हारे जाने के बाद मैंने आमिर का छोड़ा हुआ मुखौटा मेज़ की दराज़ में से निकाल कर देर तलक देखा था । और फिर उसे अपनी अलमारी में सहेजकर रख दिया था । अपनी डायरी प्यारी के साथ । पता है वो मुझे बेहद हिम्मत देता है । है न अजीब बात ? वो मुझे बताता है कि मुखौटा सब पहन के चलते है इस दुनिया में । लेकिन जरुरी नहीं कि हर एक का मुखौटा नुमायां हो । और ये भी जरुरी नहीं के हर एक मुखौटा डरावना हो । कई मुखौटे बेहद खूबसूरत शक्ल लिए होते है । अब ये आप पर है कि आप फरेब झेलने में कितने माहिर हो ।

और हाँ, उस दिन के बाद एक और तब्दीली भी आई है मुझ में । मैंने भी एक मुखौटा लगा लिया है । सदा खुश रहने वाला । पता है ये मुखौटा बेहद चमकीला है । इससे लोगों के अनचाहे सवालों से बचने में बड़ी मदद होती है । तुम्हारी शादी वाले दिन जब समीरा बाज़ी मुझे गले से लगाकर मेरे चेहरे पर कुछ ढूंढ रही थी तब भी मैंने यही मुखौटा लगा रखा था । बड़ा कामयाब रहा तजुर्बा ।उन्हें कुछ नहीं मिला । उनके चेहरे से झलकती फ़िक्र को राहत में तब्दील होते देखना बेहद अच्छा लगा मुझे । तब से मैंने इस मुखौटे को पक्का ही अपना लिया है । बहुत काम आता है कमबख्त ।

लेकिन एक बात बताऊँ ? जब सारी दुनिया नींद की आगोश में गर्क हो जाती है न तो रात के उस सन्नाटे में ये मुखौटा भी मेरा साथ छोड़ देता है । तब खुद का सामना करना बड़ा ही तकलीफदेह लगता है अर्श । और इसी वजह से मुझे रात से नफरत हो गई है । शदीद नफरत । क्या इसका कुछ उपाय हो सकता है ?

--------- ज़ारा अकरम खान

Tuesday, December 10, 2013

विनीता एजूकेशनल कैम्पेन - शिक्षा, जो कि समझ पैदा करती है

विनीता एजूकेशनल कैम्पेन
- शिक्षा, जो कि समझ पैदा करती है

शिक्षा एक ऐसा दान है, जिसे दान करने से आपका ज्ञान बढ़ता ही है, कम नहीं हो सकता. इसी बात को ध्यान में रखते हुए, "कोशिश वेलफेयर सोसाइटी" , आज 07 दिसंबर 2013 से एक अभियान शुरू करने जा रही है. हमारी टीम की कोशिश है कि कोई भी ऐसा व्यक्ति न रह जाए जो की शिक्षा से वंचित रहे.

इस अभियान को सफल बनाने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रुरत है. आप अपना योगदान शिक्षा के रूप में कभी भी कहीं भी दे सकते हैं. इंजीनियर्स, डॉक्टर्स , प्रोफेशनल्स , प्रोफेसर्स , ग्रेजुएट्स , इंटरमीडिएट , हाई स्कूल पास व्यक्ति हमारा योगदान कर सकते हैं.

हम समझ सकते हैं आप की व्यस्त ज़िन्दगी में समय निकालना मुश्किल है, इसीलिए आपकी दिनचर्या के हिसाब से शाम, सुबह , दोपहर जब आपको लगे की ये आपके पास उचित समय है, उस समय पर, आपके घर के सबसे पास स्थित स्कूल , कॉलेज में आप अपनी सेवाएँ दे सकते हैं ऐसा करने पर हमें भी ख़ुशी होगी , आपको भी ख़ुशी होगी, और जो शिक्षा ग्रहण करेंगे उन्हें भी ख़ुशी होगी.

आपके लिए सेंटर हमारी टीम निश्चित कर देगी. शिक्षा प्रसार के लिए, "कोशिश वेलफेयर सोसाइटी " का हाथ बंटाएं. और "विनीता एजूकेशनल कैम्पेन" को हर ज़रुरतमंद तक पहुंचा दें.

आप इस दान में अपनी पुरानी किताबें भी दान कर सकते हैं. अपने बैग, उन ज़रुरतमंदों को रबर, पेन्सिल, पेन, कॉपी और किताबें भी दे सकते हैं.

अगर आप इस तरह के दान देने की इच्छा रखते हैं तो हमें इस मेल आई. डी.

koshish.kanpur@gmail.com

shahid.ajnabi@gmail.com

पर अपनी डिटेल्स भेजने का कष्ट करें. हम आपके आभारी होंगे.

पूरे अभियान को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए "कोशिश वेलफेयर सोसाइटी " के महाप्रबंधक Avadhesh Sonkar को नियुक्त किया गया है

इस पूरे प्रोग्राम के संयोजक Sanjiv Singh हैं जो की प्रबंधन विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं. इस अभियान की अध्यक्षता Shahid Mansoori (Asstt. Prof. In An Engg. College ) और Kaushal Kishor (Asstt. Prof. In An Engg. College )कर रहे हैं.

हमें आपके जवाबों का इंतज़ार रहेगा. प्रतीक्षा में -

शाहिद "अजनबी"

Wednesday, July 10, 2013

मुझे धर्म से, किसी भी धर्म से कोई परहेज़ नहीं पर धर्मान्धता से जरुर जरुर है- ज़ारा अकरम खान

पिछले कुछ दिनों से फेसबुक पर आस्तिकता और नास्तिकता की बहस को फॉलो कर रही हूँ । बहसबाजी का मौसम उफान पर है । दोनों तरफ से भारी भारी दलीले देकर साबित किया जा रहा है की कैसे उन्हीं का पक्ष सही है । आस्तिकों को शिकायत है की नास्तिक वर्ग उनकी आस्था का मखौल तो उड़ाता ही है साथ ही धर्म को मानने वाले हर व्यक्ती को और धर्म को गालिया देना इन्होने अपना ‘धर्म’ बना रखा है । नास्तिकों को ऐतराज़ है की धर्म ने और उसके मानने वालों ने दुनिया में इंसानियत के पनपने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी । धर्म हर बंटवारे का मूल कारण साबित होता जा रहा है । शिकायते दोनों तरफ है, और कुछ तो सौ फीसदी जायज़ भी है । इस विषय पर बहोत ही काबिल और गुणी लोगों ने अपनी बात तर्कपूर्ण रूप से कही है । उनमे से किसी की भी बात को ना काटते हुए मैं अपनी बात कहना चाहूंगी ।
मेरा अपना ये मानना है की आस्था इंसान की पहचान नहीं जरुरत हैं । और इसीलिए इंसान की मजबूरी भी है ।
फरेब,हक-तलफी,नाइंसाफी और धोखाधड़ी से भरी इस दुनिया में आम आदमी तूफ़ान में फंसी नौका की तरह बेबस और लाचार है । सिस्टम से लड़ने का हौंसला नहीं, नाइंसाफियों के खिलाफ उठ खड़े होने की हैसियत नहीं और नित नई समस्याओं से जूझने की कूवत नहीं । ऐसे हालातों में सर्वाइव करना कोई मजाक नहीं । फिर भी इंसान सर्वाइव करता है । और हसते मुस्कुराते हुए करता है । क्यूँ....? क्यूँ की उसके पास आस्था है । किसी ईश्वरीय शक्ति के मौजूद होने का विश्वास ही उसके लिए सुकूनभरा है । जब बुरी तरह से सताया गया आदमी हालातों से हार जाता है तो मन के किसी कोने में उसे ये विश्वास जरुर होता है की एक ना एक दिन मेरी दुआए जरुर कबूल होंगी । एक ना एक दिन मुझे इन्साफ जरुर मिलेगा । अगर ये विश्वास ही ख़तम हो जाए तो इंसानी ज़िन्दगी में कुछ न बचा ! इसी विश्वास के सहारे वो मुश्किल से मुश्किल हालातों में से भी फीनिक्स की तरह परवाज़ करने का मंसूबा पालता है । किसी अदृश्य ताकत के हमारी ज़िन्दगी में मौजूद होने की कल्पना बड़ी सुखद और दिलासा देने वाली है । इंसान कदम कदम पर गलतिया करता रहता है पर जब उन गलतियों की स्वीकारोक्ति की नौबत आती है तो ये कहके खुद को आज़ाद करा लेता है की उपरवाले की यही मर्ज़ी थी । अपनी गलतियों को पीछे छोड कर आगे बढ़ने के लिए भी इंसान को ईश्वर के नाम की जरुरत है ।
आये दिन दुनिया में हैवानियत का नंगा नाच होता है, मासूमों के खून की होली खेली जाती है, नाइंसाफी के नए नए कीर्तिमान रचे जाते है । ऐसे हर घृणित कार्य को देखकर आम आदमी---कमज़ोर,मजबूर,लाचार आम आदमी---यही सोचता है की ऐसे कामों के लिए जिम्मेदार लोगों को अल्लाह/भगवान/गॉड सज़ा देगा । क्यूँ की दुनिया में तो इन्साफ नाम की चीज़ बची नहीं । वो सोचता है की ईश्वरीय शक्ति ऐसे लोगों का लेजर अकाउंट मेनटेन कर रही होगी और उनके लिए कोई सज़ा जरुर जरुर तजवीज करेगी । इसी तरह दुनिया में ऐसे लोग भी है जो बिना किसी वजह के अज़ाब भरी ज़िन्दगी जीने के लिए अभिशप्त है । असाध्य रोगों के रोगी, अपंगता के शिकार लोग, समाज के सबसे निचले तबके के लोग । उनके बारे में भी यही सोचा जाता है की एक ना एक दिन इनके दुखों के अंत जरुर होगा । सबकी सुध रखने वाला वो परम दयालु परमात्मा सबके साथ इन्साफ करेगा ।
जरा सोचिये, अगर ये विश्वास ही ख़त्म हो जाए तो फिर...! इसका मतलब तो ये हुआ की दुनिया में जो कुछ भी चल रहा है सब ठीक है । मदर टेरेसा और हिटलर एक ही श्रेणी में...। किसी बिन लादेन को कोई सज़ा नहीं मिलेगी । दहशतगर्दों की करतूत का कोई जवाब नहीं माँगा जाएगा । जिंदगीभर अनगिनत दुखों की सलीब ढोने वाले लोगों को कोई सुकून का लम्हा मयस्सर नहीं होगा । जालिम का जुल्म बदस्तूर जारी रहेगा । दबा कुचला आदमी अपनी निकृष्टतम ज़िन्दगी घसीटता हुआ जीता रहेगा और एक दिन मर भी जाएगा । कोई खुदाई इन्साफ नहीं होगा । किसी उम्मीद की किरण का कोई अस्तित्व नहीं होगा ।
और साहेबान, ईश्वरीय न्याय की उम्मीद के बगैर आदमी जीते जी मर जाएगा ।
इसीलिए आस्था का होना जरुरी हैं । आस्था वो दिया है जो घुप्प अँधेरे में भी राह पाने की उम्मीद को जिंदा रखता है ।

जाते जाते ये बताती चलूँ की मैं आस्तिक हूँ । मेरा सृष्टि के सृजनकर्ता में पूरा पूरा विश्वास हैं ।
और ये भी बता देना प्रासंगिक होगा की,
मुझे धर्म से, किसी भी धर्म से कोई परहेज़ नहीं पर धर्मान्धता से जरुर जरुर है ।

Friday, June 28, 2013

किताबें- ज़ारा अकरम खान

बहुत दिन हुए.. कोई हलचल नहीं हुयी यहाँ.. वक़्त भी न हमेशा इंसान को मशरूफ रखता है.. खैर सब छोड़ें -- किताबें जो की इंसान की सबसे प्यारी दोस्त होती हैं-- आज इसी कड़ी में ज़ारा अकरम खान साहिबा का ये आलेख आपके रूबरू कर रहा हूँ.

आज अपने पसंदीदा सब्जेक्ट किताबों के बारे में कुछ लिखने का मन कर रहा हैं | किताबे मानवजाति द्वारा की गयी सबसे बेहतरीन खोज है | सभ्यताओं को दिया गया सबसे बेहतरीन तोहफा है, ऐसा मेरा मानना है | मानना क्या दृढ विश्वास है | जितना सब कुछ हम पढने की आदत डालकर सीख सकते हैं उतना सिखाना तो किसी भी संस्थान के बस का नहीं | मेरी अपनी ज़िन्दगी में किताबों का बड़ा ही महत्वपूर्ण रोल रहा हैं | अगर आज मैं कुछ लिखने का और उसे दोस्तों के सामने पेश करने का हौसला कर पा रही हूँ तो ये किताबों की देन है | ये हुनर, ये हौसला, ये अंदाजेबयां सबकुछ पढ़ पढ़ कर आया है | वरना मेरी ऐसी औकात कहाँ...??? अपनी अब तक की छोटी सी और पाबंदियों भरी ज़िन्दगी में मैंने बहुतकुछ पढ़ा है | फिर भी लगता है कुछ भी नहीं पढ़ा | ऐसा लगता हैं जैसे महासागर से सिर्फ चुल्लू भर पानी ही निकाल कर पी पाई हूँ |

पढने के बारे में एक बात ख़ास तौर से कहना चाहूंगी | जरुरी नहीं की आप बड़े बड़े ग्रन्थ ही पढ़े | ऐसा करने पर ही आपका पढ़ा लिखा होना सार्थक होता हो | सुगम और मनोरंजक साहित्य पढना भी एक जीवन बदल देने वाला अनुभव साबित हो सकता हैं | प्रेमचंद जी से बढ़कर और क्या मिसाल हो सकती हैं...?? सीधी साधी भाषा में मानवीय जीवन की हर भावना को छुआ है उनकी लेखनी ने | उन के अलावा अनेको अनेक उदाहरण है जिनकी कलम ने हमे ज़िन्दगी के हर एक पहलू से वाकिफ कराया है | प्रेम,दया,घृणा,विश्वास,धोखा,वास्तल्य आदि सारी भावनाएं किरदारों में ढलकर हमारे सामने एक पूरी दुनिया का निर्माण करती है और उसी माध्यम से हम तक लेखक का सन्देश बाखूबी पहुँचता है |
हमारे देश में पुस्तक प्रेमियों की संख्या वैसे हमेशा ही कम रही है | हमारे यहाँ का पाठक किताब खरीदना एक महंगा शौक समझता है | कैसी विडम्बना है की दो सौ रुपए का पिज़्ज़ा हमे महंगा नहीं लगता पर सौ रुपए की किताब खरीदना हमारी नज़रों में फिजूलखर्ची है | हमारे यहाँ के सो कॉल्ड जागरूक माता-पिता अपने बच्चों के लिए क्या नहीं करते..?? उन्हें मॉल में ले जाते हैं, मल्टीप्लेक्स में महंगी टिकट खरीदकर उलजलूल फिल्मे दिखाते है, मैकडोनाल्ड का कूड़ा महंगे दामों में खरीदकर खिलाते है, महंगे विडियो गेम्स खरीदकर उन्हें चारदीवारी में कैद करने का खुद ही सामान करते हैं, एक शाम में हसते हसते सैंकड़ो रुपए फूंक डालते हैं | पर अफ़सोस की उन्हें कभी कोई किताब नहीं दिलवाते | ये कभी नहीं कहते की, बेटा ये किताब पढो, बहुत अच्छी हैं | क्यूँ हैं ऐसा..? क्यूँ कि माता पीता को ही पता नहीं की कौन सी किताब पढने लायक है | या पढना भी एक जरुरी चीज़ है | हम बच्चों को सिर्फ मनोरंजन देते हैं, ज्ञान नहीं | किताबों से उन्हें दोनों चीज़े हासिल हो सकती हैं |

पढना, ढेर पढना आपकी सोच का दायरा विस्तृत करने में आपकी मदद करता है | आपके अन्दर एक आत्मविश्वास तो जगाता ही है साथ ही आपके ज़हन को एक आज़ाद और कॉंफिडेंट विचारधारा प्रदान करता है | मेरा मानना है की मनोरंजन के हर साधन की और उसके प्रभाव की एक सीमा होती है | लेकिन एक अच्छी किताब आपके साथ उम्र भर चलती है | आपके ज़हन में महफूज़ रहती है |
न जाने कितनी महान विभूतियों ने कितना कुछ लिख छोड़ा है हमारे लिए | अगर पढना चाहे तो उम्र कम पड़ जाए | विश्व-साहित्य को छोड भी दिया जाए तो भी भारतीय साहित्य अपने आप में एक विशाल महासागर है | हिंदी में कितने श्रेष्ठ और गुणी लेखक हुए, जिनको पढना हर बार नई ज़िन्दगी जीने जैसा है | इसके अलावा मराठी,बंगाली,पंजाबी में भी साहित्य की अद्भुत परंपरा रही है | मैं जब बंकिम दा को पढ़ती हूँ तो मुझे अफ़सोस होने लगता है की क्यूँ उनकी सारी रचनाओं का हिंदी अनुवाद उपलब्ध नहीं ? या क्यूँ मुझे बंगाली नहीं आती...? इसी तरह जब दोस्तोवस्की,चेखव,गोर्की,शेक्सपियर या ऐसे ही किसी जगतप्रसिद्ध लेखक कि कृतियों का हिंदी अनुवाद पढ़ती हूँ तो दिल उसे उपलब्ध कराने वाले के लिए सैंकड़ो दुआए देने लगता है |

पढने के मामले में हमारे यहाँ की सोच और विदेशी सोच में बड़ा अंतर है | हमारे यहाँ किताबे कभी भी हमारे बजट में शामिल नहीं रही | ब्रांडेड कपडे और कॉस्मेटिक्स पर हजारों रुपए फूंकने में जरा भी ना हिचकिचाने वाला भारतीय मध्यमवर्ग जब किताबों पर खर्च करने की बात पर आता है तो हिसाब लगाने लगता है | विदेशों में ऐसा नहीं है | वहां का पाठक पहले किताब पसंद करता है, उसे बगल में दबाता है फिर पूछता है की क्या कीमत देनी है ! काश ऐसा सुदिन भारत में भी देखने को मिले | आज भी भारतीय परिवार अपने बच्चों को कोर्स की किताबों के अलावा कुछ और पढता देखता है तो कोहराम मचा देता है | ये सोच बदलना जरुरी है |

कहते है की साहित्य समाज का दर्पण है | आज की युवा पीढ़ी और आनेवाली पीढ़ी की इस दर्पण से वाकफियत करानी बहुतजरुरी है | आज का युवा रात को बेड पर सोने से पहले किसी अच्छी किताब को पढने की बजाय मोबाइल पे एसएमएस भेजने में और पाने में व्यस्त रहता है | पढ़ाई से पैदा हुई टेक्नोलॉजी पढ़ाई को ही ख़त्म करती प्रतीत हो रही है | ये खतरनाक ट्रेंड है | किसी भी घर में, किसी युवा की अलमारी में किताबों की बजाय सीडी, डीवीडी के लगे ढेर चिंताजनक है | इसे रोकना बेहद जरुरी है | महान विचारक सिसरो ने यूं ही नहीं कहा की पुस्तकों के बिना घर जैसे आत्मा बिना शरीर |

किताबों के बारे में मेरी एक फेवरेट कोटेशन हैं जो मैं अक्सर अक्षर-शत्रुओं के मुंह पर मारने से बाज़ नहीं आती | किसी सयाने ने कहा है की, a person who does not read, is no better than a person who can not read…सौ फीसदी सच बात है ये | जो पढना जानकर भी नहीं पढता वो तो अनपढ़ ही हुआ ! इसीलिए कहती हूँ, किताबों के जादूभरे संसार से अपना परिचय बढ़ाइए | उससे दोस्ती कीजिये | आप कभी तनहा नहीं रहेंगे | और बोरियत नाम की बीमारी तो आपको होगी ही नहीं |

जो मित्र किसी वजह से पढ़ नहीं पाते ( रूचि नहीं है, सब्र नहीं है, वक्त नहीं है या किताबे उपलब्ध नहीं है वगैरह वगैरह ) उनको मेरी सलाह है की वो अपने बच्चों में पढने पढ़ाने की आदत जरुर जरुर डाले | किताबों से उनका परिचय करायें | ऐसा करके आप उनके भविष्य को उज्जवल बनाने में बड़ी मदद करेंगे | शब्दों से उनकी दोस्ती कराइए और यकीन जानिये की वो ज़हनी तौर पर सक्षम और मजबूत हो जायेंगे | किताबे पढना एक अद्भुत,अनूठा एवं रोमांचकारी अनुभव है | पुस्तकों का संसार अद्वितीय है, अथाह है, उनकी जगह टेक्नोलॉजी की देन गजेटरी कभी नहीं ले सकती | अपनी बात चार्ल्स डब्ल्यू. इलियट के इस जगतप्रसिद्ध कथन से ख़त्म करना चाहूंगी....
“books are the quietest and most constant of friends; they are the most accessible and wisest counsellors, and the most patient of teachers.”

Thursday, February 7, 2013

Pustak Sameeksha


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Thursday, November 29, 2012

कोशिश- इक नई सुबह.....

 हम  नहीं जानतें जो हम  करने की सोच रहे हैं,उसमे हमारा  लोग कितना साथ देंगे जब 31 दिसंबर 2012 को सम्पूर्ण विश्व के लोग अपने अपने नशे में चूर होंगे (नशे कई तरह के हो सकते हैं इस पहलू को आप मुझसे अच्छी तरह जानते हैं ) या आप यूँ समझ ले की सब अपने अपने तरीके से नए वर्ष की प्रभात बेला का स्वागत कर रहे होंगें तब हम (कोशिश वेलफेयर सोसायिटी ) के  चंद  लोग शहर के अँधेरे गलियारों में ठण्ड में कपकपाते हुए गरीब लोगों की सर्दी को दूर करने के लिए गर्म कपड़े बाँटकर ठंडी को दूर करने की छोटी सी कोशिश कर रहें होंगे . 

क्या आप लोग हमारा  इस नेक काम में  साथ देगें ?

नोट - जो लोग इस नेक  काम  में नए या पुराने कपड़े देकर हमारा साथ देना चाहतें हो वो लोग हमें इन नंबरों में काल करके  करें ,

1- शाहिद अजनबी -9044510836
2-आनन्द पाण्डेय -9161113444
3-संजीव सिंह      -9161112444
4-कौशल किशोर  श्रीवास्तव -96959400015 
हमारी टीम आपके पास आकर वो नए या पुराने कपड़े एकत्रित कर लेगी .

निवेदक -कोशिश वेलफेयर सोसाईटी ,कानपुर .उत्तर प्रदेश .भारत .  

Monday, August 20, 2012

आप सब को ईद की दिली मुबारकबाद ! साथ में ईदी के तौर पे पिछले दिनों लिखा हुआ आपके हाथों में सौंप रहा हूँ.

इसी मोड़ पे लहराता हाथ छोड़ आया था
हाथ क्या, यूं समझो ज़िन्दगी का साथ छोड़ आया था

शकले आसुओं में मुहब्बत की विरासत दे गयी
वरना कब का मैं वो शहर छोड़ आया था

अहदे वफ़ा, रंगे मुहब्बत सब छूट गए
इक दिल था शायद वहीँ छोड़ आया था

ये साँसों का सफ़र है जो दिन-ब- दिन चल रहा है
वरना खुद को तो कब का वहीं छोड़ आया था

बेवजह ढूंढती हैं नज़रें उन आँखों की नमी को
जिसे उसी दिन मैं खुदा के हवाले छोड़ आया था

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी" 

Wednesday, July 11, 2012

माँ मेरी बहुत प्यारी है

माँ मेरी बहुत प्यारी है
मुझे डांटती है, मुझे मारती है
फिर मुझे खींच के
सीने से लिपटा लेती है
माँ मेरी बहुत प्यारी है

चौका बासन भी करती  है
घर का सारा काम वो करती है
ग़म मेरे होते हैं ,और उठा वो लेती है
माँ मेरी बहुत प्यारी है

देर रात मैं खाने को कुछ कह दूं
मेरे ऊपर चिल्लाती रहती है
मगर ख्वाहिश फिर भी पूरा करती है
माँ मेरी बहुत प्यारी है

चलो आज बैठक धो दूं
चलो आज आँगन धो दूं
कुछ नहीं, तो कोई काम निकाला करती है
माँ मेरी बहुत प्यारी है

जब भी घर से आऊँ
बस यही कहा करती है
बेटा घर खाली हो  गया
अब कब आओगे
माँ मेरी बहुत प्यारी है

उसकी उँगलियों में न जाने कौन सा जादू है
हाथ मेरे सर पे रखती है
और खुद अपनी आँखों को भिगो देती है
माँ मेरी बहुत प्यारी है

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी', कानपुर 

Wednesday, April 11, 2012

छू लो मेरे अंतर को........

ज्यादातर इस मंच पे प्रेम कवितायेँ या ज़िन्दगी की नज्में प्रकाशित की गयी हैं.. आज  आपको सरिता गुप्ता के प्रकृति प्रेम से रूबरू करता हूँ - 

# सांझ के उस झुरमुट में, 
 मैं पाती हूँ अकेला अपने को
न सुमन न भौंरे  न कलरव है 
इन मीठी सुरों की वादी का 
मौन खड़े ये वृक्ष समूह 
छिपा सूर्य जा पश्चिम 
कहती इनकी मौन वेदना 
छू लो मेरे अंतर  को........

 
छाया है प्रकृति पे नवल बसंत 
हवा बह रही  मंद मंद 
कोयल कूकती है स्वच्छंद 
धरती सजती सप्तरंग 
धरती का ये रूप देख 
होता मन मेरा देख दांग   

- सरिता गुप्ता, कानपुर
(लेखिका विद्या निकेतन गर्ल्स एजूकेशन सेंटर, हरजिंदर नगर, कानपुर में प्रधानाध्यापिका हैं )
(चित्र गूगल से साभार ) 

Sunday, March 4, 2012

दरिया होके समंदर की अदा रखता है

वो रूह में मोती जुल्फों में हवा रखता है
दरिया होके  समंदर की अदा रखता है

दिल में रखके मोहब्बत की रौशनी क्यूँ 
निगाहों में अदावत की ज़फ़ा रखता है

क्यूँ नहीं रह पाता अजीज़ दिल के पास
वक़्त बेरहम है एक फ़ासला रखता है

हम आज समझे ग़रीबों की गुमनामियां
जिसको देखो रईसों का पता रखता है

लुटा के जा रहे हैं हम सब कुछ प्यार में
देखना है कौन कितना वास्ता रखता है

आलोक उपाध्याय "नज़र"

Sunday, January 29, 2012

मुख पर मुखौटा

 ऐ ... रूचिका तेरी वो बीमार हैं। नविता ने कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए
कहा। वो कौन... साफ-साफ क्यों नहीं बतलाती? अरे वही तेरी लख्ते जिगर,
तेरी रोल माडॅल। उनकी बीमारी की खबर ने रूचिका को झकझोर दिया। अपनी बात
पूरी करते हुए नवीता ने कहा कि कल शाम जब मैं बाजार से वापस आ रही थी तो
वे अपने पति के साथ हास्पिटल में दाखिल हो रहीं थी।

वे मतलब डा0 वीणा वर्मा। बेहद तेज समाजशास्त्री। कालेज में अपने विषय पर
उनसा पकड़ शायद ही किसी का हो। आदर्शवादी। कल्चरल प्रोग्राम हो या सेमिनार
उनकी मौजूदगी के बिना सब बेकार। पिछले साल एन. एस. एस. कैम्प के दौरान
’टूटते संयुक्त परिवार’ विषय पर सम्पन्न वाद-विवाद प्रतियोगिता की वह
निर्णायक थीं, जिसमें रूचिका ने अव्वल स्थान पाया था।

रूचिका डॉ0 वीणा वर्मा के व्यक्तित्व से इतना प्रभाावित हुई की, कब वह
उनकी व्यावहारिक शिष्या बन गयी, पता न चला। उसे पूरी तरह याद है कि महिला
विस पर बतौर मुख्य अतिथि श्रीमती वर्मा ने ’महिला उत्पीड़न’ विषय पर बोलते
हुए किस तरह समाज के ठेकेदारों का बखिया उखेड़ा था। हर पहलू पर समान
दृष्टिकोण से संयमित लहजे में नारी पर हो रहे अत्याचार पर व्याख्यान
प्रस्तुत कियाद। हेज उत्पीड़न, हत्या, बलात्कार, कन्या भ्रूण हत्या, अंग
प्रदर्शन व उनके पिछड़ेपन जैसे तमाम पहलूओं पर सूक्ष्म दृष्टिपात किया।
महिलाओं की व्यथा व उनकी अन्तर्कथा पर खूब बोलीं। कुछ मामलों में तो
उन्होने खुद औरतों को दोषी ठहराया। मसलन कन्या भ्रूण हत्या।

नवीता से उनकी बीमारी की खबर पाकर रूचिका उनके घर की जानिब मुखातिब हुई।
रास्ते भर ढ़ेर सारी कल्पनाओं के तालाब में हिमखण्डों की माफिक उसके जेहन
में तैर रही थीं, उनका व्याख्यान, मृदुस्वभाव, महिलाओं के प्रति तटस्थता
आदि। उनके घर पहुंचते ही वह उनका कोमल स्पर्श देगी। उनका हाथ अपने हाथ
में लेकर पूछेगी, कैसी हैं मैडम? अगर सर दुःख रहा हो तो सहला दूं। अभी
कल्पनाओं का संसार खत्म भी नहीं हुई थी कि डॉ0 वीणा वर्मा का घर आ गया।
अचानक रूचिका की तन्द्र टूटी। आहिस्ता से उसने मैडम का कॉलबेल बजाया।
..... कुछ पल के बाद दरवाजा खुला। एक महिला ने अन्दर से झांक कर पूछा....
कौन? जी मैं... मैडम घर पर हैं? अन्दर आइए, मैडम अभी हास्पिटल में ही
हैं। क्या हुआ है उनको, सोफे पर बैठते हुए रूचिका ने पूछा? महिता सकुचाते
हुए बोली... हुआ क्या है बस, पानी भरा गिलास रूचिका की तरफ बढ़ाते हुए
उसने कहा। रूचिका उसकी तरफ सवालिया नजर से देखती रही। अचानक हकीकत उसके
जुबान से लरज उठी। उनको पहला लड़का है, अब फिा दिन चढ़ गये थे। सोनोग्राफी
में लड़की निकली। और वे सफाई ...। उन्हे इस बार भी बेटा चाहिए था।
पूरी बात सुनकर रूचिका के हाथ से गिलास टूट कर रेजा-रेजा हो गया। गिलास
टूटने के साथ ही मैडम के आदर्शों के प्रति उसकी श्रद्धा भी चकनाचूर हो
गई। आस्था की प्रतिमा यथार्थ से टकराकर बिखर गयी। मुख के भीतर का मुखैटा
नुमाया हो गया। बोझिल कदमों से रूचिका ढ़हते खण्डहर की तरह यथार्थ के रेत
पर मिटते निशान छोड़ते हुए वापस घर चली आयी।

- एम. अफसर खां सागर

Sunday, January 22, 2012

आकांक्षा यादव को मानद डाक्टरेट की उपाधि

      विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार के सोलहवें महाधिवेशन में युवा कवयित्री, साहित्यकार एवं चर्चित ब्लागर आकांक्षा यादव को मानद डाक्टरेट (विद्यावाचस्पति) की उपाधि से विभूषित किया गया। आकांक्षा यादव को मानद डाक्टरेट की इस उपाधि के लिए उनकी सुदीर्घ हिंदी सेवा, सारस्वत साधना, शैक्षिक प्रदेयों, राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में महनीय शोधपरक लेखन के द्वारा प्राप्त प्रतिष्ठा के आधार पर अधिकृत किया गया। उज्जैन में आयोजित कार्यक्रम में उज्जैन विश्वविद्यालय के कुलपति ने यह उपाधि प्रदान की।

गौरतलब है कि आकांक्षा यादव की रचनाएँ देश-विदेश की शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित हो रही हैं। नारी विमर्श, बाल विमर्श एवं सामाजिक सरोकारों सम्बन्धी विमर्श में विशेष रूचि रखने वाली आकांक्षा यादव के लेख, कवितायें और लघुकथाएं जहाँ तमाम संकलनों /पुस्तकों की शोभा बढ़ा रहे हैं, वहीं आपकी तमाम रचनाएँ आकाशवाणी से भी तरंगित हुई हैं। पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ इंटरनेट पर भी सक्रिय आकांक्षा यादव की रचनाएँ तमाम वेब/ई-पत्रिकाओं और ब्लॉगों पर भी पढ़ी-देखी जा सकती हैं। व्यक्तिगत रूप से ‘शब्द-शिखर’(http://shabdshikhar.blogspot.com) और युगल रूप में ‘बाल-दुनिया’ (http://balduniya.blogspot.com
),‘सप्तरंगी प्रेम’ (http://saptrangiprem.blogspot.com) व ‘उत्सव के रंग’ (http://utsavkerang.blogspot.com) ब्लॉग का संचालन करने वाली आकांक्षा यादव न सिर्फ एक साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं, बल्कि सक्रिय ब्लागर के रूप में भी उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। ’क्रांति-यज्ञ: 1857-1947 की गाथा‘ पुस्तक का कृष्ण कुमार यादव के साथ संपादन करने वाली आकांक्षा यादव के व्यक्तित्व-कृतित्व पर वरिष्ठ बाल साहित्यकार डा0 राष्ट्रबन्धु ने ‘बाल साहित्य समीक्षा‘ पत्रिका का एक अंक भी विशेषांक रुप में प्रकाशित किया है।

मूलतः उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और गाजीपुर जनपद की निवासी आकांक्षा यादव वर्तमान में अपने पतिदेव श्री कृष्ण कुमार यादव के साथ अंडमान-निकोबार में रह रही हैं और वहां रहकर भी हिंदी को समृद्ध कर रही हैं। श्री यादव भी हिंदी की युवा पीढ़ी के सशक्त हस्ताक्षर हैं और सम्प्रति अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ हैं। एक रचनाकार के रूप में बात करें तो आकांक्षा यादव ने बहुत ही खुले नजरिये से संवेदना के मानवीय धरातल पर जाकर अपनी रचनाओं का विस्तार किया है। बिना लाग लपेट के सुलभ भाव भंगिमा सहित जीवन के कठोर सत्य उभरें यही आपकी लेखनी की शक्ति है। उनकी रचनाओं में जहाँ जीवंतता है, वहीं उसे सामाजिक संस्कार भी दिया है।

इससे पूर्व भी आकांक्षा यादव को विभिन्न साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। जिसमें भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ‘वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान‘, राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ’भारती ज्योति’, ‘एस0एम0एस0‘ कविता पर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा पुरस्कार, इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था, बिजनौर द्वारा ‘साहित्य गौरव‘ व ‘काव्य मर्मज्ञ‘, श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति साहित्यमाला, कानपुर द्वारा ‘साहित्य श्री सम्मान‘, मथुरा की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘आसरा‘ द्वारा ‘ब्रज-शिरोमणि‘ सम्मान, मध्यप्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ‘साहित्य मनीषी सम्मान‘ व ‘भाषा भारती रत्न‘, छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ‘साहित्य सेवा सम्मान‘, देवभूमि साहित्यकार मंच, पिथौरागढ़ द्वारा ‘देवभूमि साहित्य रत्न‘, राजेश्वरी प्रकाशन, गुना द्वारा ‘उजास सम्मान‘, ऋचा रचनाकार परिषद, कटनी द्वारा ‘भारत गौरव‘, अभिव्यंजना संस्था, कानपुर द्वारा ‘काव्य-कुमुद‘, ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ‘शब्द माधुरी‘, महिमा प्रकाशन, दुर्ग-छत्तीसगढ द्वारा ’महिमा साहित्य भूषण सम्मान’, अन्तर्राष्ट्रीय पराविद्या शोध संस्था,ठाणे, महाराष्ट्र द्वारा ‘सरस्वती रत्न‘, अन्तज्र्योति सेवा संस्थान गोला-गोकर्णनाथ, खीरी द्वारा ’श्रेष्ठ कवयित्री’ की मानद उपाधि, जीवी प्रकाशन, जालंधर द्वारा ’राष्ट्रीय भाषा रत्न’ इत्यादि शामिल हैं।

विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार के इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न भागों में कार्यरत हिन्दी सेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि, विभिन्न विश्वविद्यालयों के विद्वान, शिक्षक-साहित्यकार, पुरातत्वविद्, इतिहासकार, पत्रकार और जन-प्रतिनिधि शामिल थे। उक्त जानकारी विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ के कुल सचिव डा. देवेंद्र नाथ साह ने दी।

दुर्गविजय सिंह ’दीप’
उपनिदेशक - आकाशवाणी (समाचार)
पोर्टब्लेयर, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह

Thursday, January 12, 2012

मेरा हमसफ़र

एक बार फिर कौशल सा'ब का कलाम आपकी आँखों  में सरमाया करना चाहता हूँ क़ुबूल करें .. आपकी दुआओं का तलबगार रहूँगा..

आधा छूटा हुआ जाम
खुली हुई किताब
रिन्दों का साथ
फिर भी अकेला हूँ
याद आती है वो याद
जिनमें  मैं जवाँ हुआ         
क्या कहूं?
उस रात की बात
मेरा हबीब मुझसे जुदा हुआ
वो हसीं लम्हे,
उनकी जुल्फों का साथ
उनके झुमके की खनक
वो बिंदिया  की चमक
अँधेरे में उजाला देने वाली
याद आती है वो याद
जिनमें मैं जवाँ हुआ
क्या करूँ?
कैसे मिटाऊँ उनकी याद
उनका हमसफ़र जो बदल गया 

- कौशल किशोर, कानपुर

http://dilkikashmakash.blogspot.com/
( और गहराई से इनको यहाँ पढ़ा जा सकता है)
 

Tuesday, November 22, 2011

हिना के जैसी सुन्दर थी

वो कितनी प्यारी  प्यारी  थी
कुछ खुशबू सौंधी  सौंधी थी
कुछ हिना के जैसी सुन्दर थी
कुछ गुलशन जैसी महकी थी
कुछ समीर सी चंचल थी
कुछ माखन सी तासीर भी थी
वो कितनी प्यारी प्यारी थी


एक दिल था भोला  भाला सा
जिसमे कितनी गहराई थी
नैना थे बिलकुल हिरनी से
दुनिया की जिनमे परछाईं थी
सीरत तो बिलकुल ऐसी कि  
जैसे खुदा से शोहरत पायी थी
वो कितनी प्यारी प्यारी थी.

जब मुझे देखती थी वो तब
सारी खुशियाँ मिल जाती थी
सोंचा इक दिन मैंने कि
बस उसकी तस्वीर बना डालूँ
पर बन कर जब तैयार हुई
तो अपनी ही बेटी पाई थी.
अब इतना ही बस कहना है
वो कितनी प्यारी प्यारी है.
वो सबसे  प्यारी प्यारी है.
- कौशल किशोर, कानपुर

Saturday, November 12, 2011

तू भी कल प्यार में हो

आज एक और कलम की इबारत आपके हाथों  में सौंप रहा हूँ. कौशल किशोर जो की एक इंजीनियरिंग कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. उनकी लिखी एक नज़्म कुछ यूँ हैं - 

मत उठा मेरे प्यार पे ऊँगली ऐ शाहिद 
मत करो दूर दो रूंहों को अलग ऐ शाहिद 
हम भी अल्लाह के बन्दे हैं कुछ तो डर ऐ शाहिद 
कहीं ऐसा न हो कि, तू भी कल प्यार में हो 
और बन जाऊं मैं शाहिद 

- कौशल किशोर, कानपुर
( शाहिद एक अरबी लफ्ज़ है जिसका मायने गवाह है ) 

Tuesday, November 1, 2011

आज तक

आज फिर  आपके सुपुर्द आलोक  उपाध्याय "नज़र" के शे'रों को कर रहा हूँ- 

टूटे इकबारगी,  बिखर रहे हैं आज तक 
ज़िन्दगी की क़ैद में मर रहे हैं आज तक 

वो बेबाक़ था, दिल को छलनी  कर गया 
हम दिल की सुराखें भर रहे हैं आजतक 

लोग उम्र काट देते है किसी एक के सहारे
उसी के याद में दिन गुज़र रहे है आजतक 
 
- आलोक  उपाध्याय "नज़र"

Sunday, September 18, 2011

फेसबुक - Facebook

इस पैरोडी का लुत्फ़ उठायें -

मेरे जीने का सहारा फेसबुक
मेरे मरने का सहारा फेसबुक
सुबह हुई फेसबुक
दोपहर हुई फेसबुक
शाम आई फेसबुक
रात होने को है फेसबुक

बत्ती गुल, मोबाईल पे चलता है फेसबुक
कोई नया बन्दा आया दुनिया में
खबर देता है फेसबुक
मरने की घड़ी है
Status अपडेट करता है फेसबुक

पापा ने पूछा 'खाना खा लो"
मम्मी ने कहा- 'बेटा पानी पी लो'
But वो तो Busy  है सिस्टर को दिखाने में फेसबुक

कभी पेज Create करता है
कभी बनता है किसी ग्रुप का Admin 
बस उसे तो मतलब है
Like  और Comments  से
न शादी से न टेंट से
you  Tube  पे जाके करता है
Share  कोई गाना 
नहीं परवाह
सुने चाहे मामा, सुने चाहे नाना

क्लास में है फेसबुक
घर में है फेसबुक
wash  रूम में है फेसबुक
उल- जुलूल फोटो करता है Tag 
चाहे क्लास में भूल जाये अपना Bag 

जानता है-
नज़र भर नहीं देखी उसकी Applications 
फिर भी बार-बार चैक करता है Notifications 
घर भर के Profile  बना डाले उसने
कभी इससे Log  In करता है
कभी उससे Log  In  करता है
पर नज़रों में रहता है बस फेसबुक

कहाँ रही वो ज़मीनी हकीकतें
कहाँ  रहे वो संस्कार
न रहा वो प्रेम
न रहा शाश्वत प्यार 
फेसबुक का इंसान खुश है 
देख कर Virtual  संसार 

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी "अजनबी"

Sunday, June 5, 2011

रुंधे हुए गले का जवाब


अपने गुज़रे हुए कल को सोचते- सोचते ऐसी जगह पहुँच गया जहाँ एक नज़्म नमूदार हो गयी। आज वही नज़्म आपके हाथों में सोंप रहा हूँ. आपके प्यार का इंतजार रहेगा -

तंगहाली की वो आइसक्रीम
चन्द
रुपयों के वो तरबूज
किसी गली के नुक्कड़ की वो चाट
सुबह
- सुबह
पूड़ी
और जलेबी की तेरी फरमाइश
मुझे आज भी याद है
कैसे
भूल जाऊं

अम्मी से पहली मुलाकात
और मेरी इज्ज़त रखने के लिए
पहले से खरीदा गया तोहफा
मेरे हाथों में थमाना
ये कहते हुए कि
अम्मी को दे देना
कैसे भूल जाऊं

वो
नेकियों वाली
शबे
बरात कि अजीमुश्शान रात
कहते हैं
हर
दुआ क़ुबूल होती है उस रात
मुहब्बत से मामूर दिल
और
बारगाहे इलाही में
उट्ठे हुए हाथ
हिफाजते
मुहब्बत के लिए
कैसे भूल जाऊं

कैसे
भूल जाऊं
वो पाक माहे रमज़ान
सुबह सादिक का वक़्त
खुद के वक़्त की परवाह किये बगैर
सहरी के लिए मुझको जगाना
दिन भर के इंतज़ार के बाद
वो मुबारक वक्ते अफ्तारी
हर रोज मिरे लिए कुछ मीठा भेजना
कैसे भूल जाऊं

मेरा
वक़्त- बे- वक़्त डांटना
क्यूँ
भेजा था तुमने
कल
से मत भेजना
और वहां से-
वही
मखमली आवाज़ में
रुंधे हुए गले का जवाब
हो सकता है
ये
आखिरी अफ्तारी हो
खा लो शाहिद
मेरे हाथों की बनी हुयी चीजें
जाने
कब ये पराये हो जाएँ
कैसे भूल जाऊं.......

- मुहम्मद शाहिद मंसूरी 'अजनबी"